Sunday, 2 August 2020

श्रावणी उपाकर्म

श्रावणी-उपाकर्म, ऋषि-तर्पण, वेद-स्वाध्याय पर्व, रक्षा-बन्धन, विश्व-संस्कृत दिवस

तिथि - श्रावण पूर्णिमा वि. सं. २०७७
दिनांक - ३/८/२०२० ई. सोमवार

ऐसे मनाएं श्रावणी पर्व व रक्षाबन्धन

(१) श्रावणी उपाकर्म - "श्रावणी" शब्द श्रु श्रवणे धातु से ल्युट् प्रत्यय पूर्वक छन्दसि (वेदार्थ) में स्त्री लिंग में श्रावणी शब्द सिद्ध होता है। जिसका अर्थ होता है :---- सुनाये जाने वाली। 


क्या सुनाये जाने वाली? 

जिसमें वेदों की वाणी को सुना जाये। वह "श्रावणी" कहाती है। अर्थात् जिसमें निरन्तर वेदों का श्रवण-श्रावण और स्वाध्याय और प्रवचन होता रहे। वह श्रावणी है।

    "उपाकर्म" उप+आ+कर्म = उपाकर्म। उप= सामीप्यात् , आ=समन्ताद, कर्म =यज्ञीय कर्माणि।

 जिसमें ईश्वर और वेद के समीप ले जाने वाले यज्ञ कर्मादि श्रेष्ठ कार्य किये जायें, वह "उपाकर्म" कहाता है। 

"अध्ययनस्य उपाकर्म उपाकरणं वा" (पारस्कर गृह्य सूत्र २,१०,१-२) 

अर्थात् यह समय स्वाध्याय का उपकरण था। उप=समीप, +आकरण=ले आना, जनता को ऋषि-मुनियों, समाज के विद्वानों के समीप ले आना। 

(२) ऋषि तर्पण -  जिस कर्म के द्वारा ऋषि मुनियों का और आचार्य, पुरोहित, पंडित जो विशेषकर वेदों के विद्वान है उनका तर्पण किया जाता है, उन्हें यथेष्ट दान देना अर्थात् उनके वचनों को सुनकर उनका सम्मान करना ही "ऋषि-तर्पण" कहाता है।
    
(३) वेद स्वाध्याय पर्व  - स्वाध्याय भारत की संस्कृति का प्रधान अंग है। ब्रह्मचारी के लिए आदेश है - "आचार्याधीनो वेदमधीष्व" = आचार्य के अधीन रहकर वेदाध्ययन करते रहो।

 स्नातक हो जाने पर गृहस्थी के लिए आदेश है - "स्वाध्यायान्मा प्रमदः, स्वाध्याय प्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम्" विद्याध्ययन कर चुकने के बाद भी स्वाध्याय करते रहना। 

वानप्रस्थी के लिए आदेश है - "स्वाध्याये नित्य युक्तः स्यात्" सदा स्वाध्याय में युक्त रहे। 

संन्यासी के लिए आदेश है - "संन्यसेत्सर्वकर्माणि वेदमेकं न संन्यसेत्" सब कुछ छोड़ दें, परंतु वेद का स्वाध्याय ना छोड़ें। 

श्रावण माह में ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यासी, ब्राह्मण क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र सभी को स्वाध्याय में लगने का आदेश है। 

(४) यज्ञोपवीत धारण - यज्ञोपवीत ज्ञान ग्रहण करने का बाह्य चिह्न है। इसीलिए इस समय जिन लोगों ने यज्ञोपवीत नहीं धारण किया हुआ है, उन्हें नया यज्ञोपवीत धारण करना चाहिए। अर्थात इस बात का संकल्प करना चाहिए कि वे अज्ञान, अंधकार से बाहर निकलेंगे और ज्ञानवान् होकर परिवार, समाज, राष्ट्र को प्रकाशित करेंगे।

 जिन लोगों ने यज्ञोपवीत धारण किया हुआ है, उन्हें पुराने यज्ञोपवीत को उतारकर नया धारण करना चाहिए। अर्थात् इस बात का संकल्प करना चाहिए कि वह अपने जीवन में स्वाध्याय और यज्ञ को कभी नहीं छोडेंगे। विशेषकर यज्ञोपवीत में तीन धागे होते है । वे तीन ऋणों के प्रतीक है। ऋषि ऋण, देव ऋण, पितृ ऋण। मनुष्य को इन तीनों ऋणों का बोध हो, यही उद्देश्य है।

(५) विश्व संस्कृत दिवस -"सा प्रथमा संस्कृति विश्ववाराः"  संसार की सबसे प्राचीनतम संस्कृति "वैदिक संस्कृति" है। जो समस्त विश्व को वरणीय है अर्थात् सारा संसार जिस सभ्यता और संस्कृति का गुणगान करता है । वह संस्कृति और कोई नहीं, अपितु वैदिक संस्कृति है। जो संस्कृत पर अवलंबित है। आज जबसे हमने संस्कृत भाषा से नाता तोड़ लिया है, मानो यह वसुन्धरा हमसे रूठ सी गई है। संस्कृत के छोड़ देने से हमारी संस्कृति छूट गई, हमारी सभ्यता छूट गई,  हमारा ज्ञान विज्ञान छूट गया है।

     संस्कृत भाषा तो देवों की वाणी है। संस्कृत भाषा ईश्वर की वाणी है। संस्कृत भाषा वेद की भाषा है। संस्कृत भाषा सभी भाषाओं की जननी है। यही वह भाषा है जिसकी अपनी ध्वनि व देवनागरी लिपि है। जो पूर्ण रूप से वैज्ञानिक और ईश्वर द्वारा प्रदत्त है। संस्कृत भाषा भारतीय संस्कृति की प्राण है। संस्कृत के बिना भारत की संस्कृति अधूरी है। दुनिया में सबसे अधिक वाङ्गमय  (साहित्य) संस्कृत भाषा के हैं।  सबसे अधिक शब्दों का भंडार  संस्कृत भाषा का है। 

वेद स्वाध्याय के इस महान पर्व पर संस्कृत के प्रचार प्रसार के लिए समाज के मनीषियों ने इस दिन को संस्कृत दिवस के रूप में मनाने का निश्चय किया है। संस्कृत भाषा कठिन नहीं, अपितु सरल, मधुर, कर्णप्रिय बोलने में अति रुचिकर है। इस देश में महाभारत काल के पश्चात स्वामी शंकराचार्य तक आपस में सभी संस्कृत में ही वार्तालाप किया करते थे । यहां तक जब स्वामी दयानन्द कार्य क्षेत्र में उतरे तो उनके व्याख्यान की भाषा भी संस्कृत हुआ करती थी । अर्थात् भारत के लोग स्वामी दयानन्द के काल में भी अच्छी तरह से संस्कृत समझ लिया करते थे। आइए संस्कृत भाषा के संरक्षण, संवर्धन, प्रचार, प्रसार में योगदान दें। इसकी उन्नति में अपनी उन्नति समझें। 

संस्कृत वाङ्गमय को समझने के लिए पढ़ने के लिए जानने के लिए आप हमारे पेज पर आमंत्रित हैं :--  वैदिक-संस्कृत , लौकिक संस्कृत , शिशु-संस्कृतम्, आर्ष दृष्टि, चाणक्य नीतिकथा मञ्जरी, काव्याञ्जलिः, सूक्ति-सुधा, वैदिक विचारधारा, वैदिक संस्कार, शब्दानुशासनम्, वेदवाणी, पाणिनि महाविद्यालय रेवली, स्वाध्यायः, आर्यावर्त्त-गौरवम्, वाल्मीकीय रामायण, महाभारत, गीता का ज्ञान, आयुर्वेद और हमारा जीवन, जीवन का आधार, भाषाणां जननी संस्कृत भाषा, संस्कृत प्रश्न मञ्च, संस्कृत नौकरी, भारत महान्, गीर्वाणवाणी, भारत रत्न राजीव दीक्षित जी, पटाक्षेपः, भारतीयं विज्ञानम्, गृहस्थ का केन्द्र नारी, सद्विचाार, चलचित्रम्, हमारी परम्पराएं, गावो विश्वस्य मातरः, वीरभोग्या वसुन्धरा, तन स्वदेशी मन स्वदेशी, 
किसी ने कहा है -

"मातुः स्तन्यं विना बालो यथा नो पुष्टिमर्हति।
समाजो भारतीयोsयं अपुष्टः संस्कृतं विना।।"

     अर्थ - जैसे माता के स्तनपान के बिना बालक पुष्ट नही होता है। अर्थात् बालक के सम्पूर्ण विकास के लिये जैसे माता का दुग्ध अत्यावश्यक है, ठीक वैसे ही संस्कृत के बिना भारतीयता भी अपुष्ट है।

(६) रक्षाबन्धन - रक्षाबंधन का पर्व भारत की संस्कृति से जुड़ा पर्व है। राजपूत काल में अबलाओं द्वारा अपनी रक्षा के लिए वीरों के हाथ में राखी बांधने की परिपाटी का प्रचार हुआ। जिस किसी वीर क्षत्रियों को कोई अबाला राखी भेजकर अपना राखी बंद भाई बना लेती थी वो उसकी रक्षा करना अपना कर्तव्य समझता था। इतिहास में ऐसी बहुत सारी घटनाएं दर्ज है जहां पर भाइयों ने अपने प्राणों की आहुति दे कर बहनों की रक्षा की है। ध्यान देने की बात यह है कि यह त्यौहार सिर्फ अपने देश में मनाया जाता है अन्य किसी देश में नहीं। अपना ही ऐसा देश है जिसमें कोई भी अबला किसी पुरुष के हाथ में राखी बांधकर उसे जीवन भर का अपना भाई बना लेती है और वह भाई उस बहन को आश्वासन देता है कि वह जीवन भर उसकी सहायता रक्षा करेगा। इस दृष्टि से यह त्यौहार भारत की संस्कृति के आध्यात्मिक पथ पर गहरा प्रकाश डालता है।
     
विशेष - आवश्यक रुप से अपने घरों में यज्ञ करें। श्रावणी उपाकर्म के विशेष मंत्रों से आहुति प्रदान करें। घर के बालक जो दस बारह वर्ष से अधिक आयु के हो गए हैं या समझदार हैं, उनका यज्ञोपवीत संस्कार अवश्य करें। यज्ञोपवीत का महत्व बताएं। जिन्होंने यज्ञोपवीत धारण किया हुआ है, वह पुराना उतार कर नया यज्ञोपवीत धारण करें। 

वेद पढ़ने-पढ़ाने का संकल्प लें, स्वाध्याय करने का संकल्प लें, प्रतिदिन यज्ञ करने का संकल्प लें, अपनी बहनों एवं मातृशक्ति की रक्षा करने का संकल्प लें, बहनों को विशेष रूप से प्रशिक्षित करें सावधान करें कि हिंदुओं के भेष में छुपे हुए मुसलमान युवकों के साथ दोस्ती ना करें । बस यही संदेश है श्रावणी पूर्णिमा का । इस संदेश को घर-घर पहुंचाएं, ऐसे ही मनाएं श्रावणी पर्व।

   श्रावणी-उपाकर्म, ऋषि-तर्पण, वेद-स्वाध्याय पर्व, रक्षा-बन्धन, विश्व-संस्कृत दिवस की आप सभी को शुभकामनाएं। परमात्मा आप सभी को उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु, ऐश्वर्य, यश, कीर्ति प्रदान करें। और ऐसे ही व्यस्त रहें, स्वस्थ रहें, मस्त रहें।

Saturday, 25 July 2020

दर्श पौर्णमास यज्ञ

========================

संकलनकर्त्ता--- योगाचार्य डॉ. प्रवीण कुमार शास्त्री

(१.) वैदिक यज्ञों के सात प्रमुख हविर्यज्ञो में से तीसरा यज्ञ है---दर्शपौर्णमास यज्ञ ।

(२.) दर्शयाग अमावास्या को होता है ।

(३.) पौर्णमास यज्ञ पूर्णिमा को  होता है ।

(४.) दर्शपौर्णमास ६ यागों का समुच्चय है ।


(५.) दर्श यागों के ३ समूह है ।

(६.) पौर्णमास यागों के भी ३ समूह हैं ।

संकलनकर्त्ता--- योगाचार्य डॉ. प्रवीण कुमार शास्त्री

(७.) यज्ञों में अग्नि का आधान क्रमशः अमावस्या और पूर्णिमा को होता है ।

(८.) यागविधि प्रतिपदा के दिन सम्पन्न होती है .।

(९.) छः कर्म एक ही फल देते हैं ।

(१०.) अमावस्या के तीन याग हैं --अग्नि प्रीत्यर्थ पुरोडाशयाग, इन्द्र प्रीत्यर्थ पुरोडाशयाग और इन्द्र प्रीत्यर्थ पयोद्रव्यकयाग

(११.) पूर्णिमा के भी तीन याग हैं---अष्टकपाल पुरोडाशयाग, उपांशुयाग और एकादश कपाल पुरोडाशयाग

संकलनकर्त्ता--- योगाचार्य डॉ. प्रवीण कुमार शास्त्री

(१२.) दर्शपौर्णमास याग ३० वर्षों तक अनवरत अखण्डित चलता है ।

(१३.) ३० वर्षं में कुल पूर्णिमा ३६० और कुल अमावस्या भी ३६० होती है ।

(१४.) दाक्षायण यज्ञ १५ वर्षं तक किया जाता है ।

(१५.) यज्ञ के दिन को "उपवसथ" कहा जाता है ।

(१६.) यज्ञ के द्वितीय दिन को "यजनीय" कहा जाता है ।

(१७.) इसमें यजमान चार पुरोहितों को नियुक्त करता है ।

(१८.) दर्श की दृष्टि में पुरोडाश के देवता इन्द्र एवं इन्द्राणी हैं ।

Friday, 3 July 2020

वेदपाठ का विश्लेषण

==========================


वेदों में किसी प्रकार की कोई मिलावट ना हो, इसके लिए हमारे मनीषियों, विद्वान् ब्राह्मणों ने, ऋषियों ने अनेक उपाय किए । उनमें से एक उपाय है वेद मंत्रों के पाठ का । ये पाठ इस प्रकार से किए गए हैं कि कोई भी व्यक्ति एक भी अक्षर की मिलावट नहीं कर सकता ।

सच तो यह है कि संपूर्ण विश्व में किसी भी भाषा अथवा ग्रंथ में इतनी विशुद्ध उच्चारण परंपरा नहीं पाई जाती है ।वेद पाठियों के मुख से आज भी वेदों का सस्वर उच्चारण ठीक उसी प्रकार से विशुद्ध रूप में सुना जा सकता है जैसा कि प्राचीन युग में किया जाता था ।


प्रत्येक शाखा के पदपाठ के पदपाठकर्त्ता ऋषि पृथक् पृथक् हैं । जैसे ऋग्वेद की "शाक्ल शाखा" के पदपाठकर्त्ता शाकल्य ऋषि, यजुर्वेदीय "तैत्तिरीय शाखा" के आत्रेय तथा सामवेदीय "कौथुम शाखा" के पदपाठकर्त्ता गार्ग्य ऋषि हैं । संकलनकर्ता :-- योगाचार्य डॉक्टर प्रवीण कुमार शास्त्री

×××××××××××××××××

वेदों के दो प्रकार के पाठ किए गए हैं :--- 

(१.) संहिता पाठ :--- संहिता पाठ को प्रकृति पाठ भी कहते हैं, अर्थात् वेदों में जिस प्रकार से और जिस क्रम से वर्ण, अक्षर, शब्द और वाक्य रखे हुए हैं, ठीक उसी प्रकार से, उसी क्रम से पाठ करना संहिता पाठ है । इसे "प्रकृति पाठ" भी कहते हैं । यह पाठ ही वेद का मूल रूप है । यह तीन प्रकार का है । संकलनकर्ता :-- योगाचार्य डॉक्टर प्रवीण कुमार शास्त्री

"संहिता" शब्द का स्वरूप बतलाते हुए महर्षि पाणिनि ने अष्टाध्यायी (१/४/१०८) में लिखा है :---"परः सन्निकर्षः संहिता" अर्थात् वर्णानामतिशयितः सन्निधिः संहितासंज्ञः स्यात् । वर्णों के अत्यंत सन्निकर्ष अर्थात् समीपता की संहिता संज्ञा होती है । संकलनकर्ता :-- योगाचार्य डॉक्टर प्रवीण कुमार शास्त्री

 आचार्य कात्यायन ने लिखा है :--- "वर्णानामेकप्राणयोगः संहिता" अर्थात् वेदवाणी का वह प्रथम पाठ जो गुरु परंपरा से अध्ययनीय है तथा जिसमें वर्णों एवं पदों की एकश्वासरूपता या अत्यंत सान्निध्य के लिए संप्रदायानुगत संधियों तथा अवसानों से युक्त और उदात्तानुदात्त स्वरित रूपी त्रिविध स्वरों में अपरिवर्तनीयता से पठनीय वेदपाठ को "संहिता पाठ" कहते हैं । संकलनकर्ता :-- योगाचार्य डॉक्टर प्रवीण कुमार शास्त्री

संहिता पाठ को याज्ञवल्क्य शिक्षा में पुण्यप्रदा यमुना नदी का स्वरूप बतलाया गया है :---"कालिन्दी संहिता ज्ञेया" । संहिता पाठ से सूर्य लोक की प्राप्ति होती है :---"संहिता नयते सूर्यपदम्" । संकलनकर्ता :-- योगाचार्य डॉक्टर प्रवीण कुमार शास्त्री

संहिता पाठ ही पदपाठ का मूल है । जैसा कि निरुक्तकार महर्षि यास्क ने लिखा है :----"पदप्रकृतिः संहिता" । अतः यह प्रथम प्रकृति पाठ माना गया है । ऋषियों द्वारा दृष्ट इस संहिता रूप वेदपाठ का ही याज्ञिक अनुष्ठानों के समय देवता स्तुति आदि में प्रयोग किया जाता है । इसीलिए कहा जाता है :---"आचार्याः सममिच्छन्ति पदच्छेदं तु पण्डिताः" । संकलनकर्ता :-- योगाचार्य डॉक्टर प्रवीण कुमार शास्त्री

(२.) विकृति पाठ :---- विकृति पाठ वे पाठ है जो संहिता से भिन्न क्रम से पाठ किए जाते हैं । इसको विभिन्न तरह से किया जाता है और यह आठ तरह के पाठ हैं ।

इस प्रकार दोनों पाठों को मिलाकर कुल ११ पाठ होते हैं ।

११ पाठ के पहले तीन पाठ को प्रकृति पाठ व अन्य आठ को विकृति पाठ कहते हैं।

==========

 १ संहिता पाठ
 २ पदपाठ
 ३ क्रमपाठ 

===========

(१.) जटापाठ
(२.) मालापाठ
(३.) शिखापाठ
(४.)  लेखपाठ
(५.)  दण्डपाठ
(६.) ध्वजपाठ
(७.) रथपाठ
(८.) घनपाठ

============


 इसमें वेद मन्त्रों के पद को अलग किये बिना ही यथावत्  पढा जाता है।
 जैसे 
 अ॒ग्निमी॑ळे पु॒रोहि॑तं य॒ज्ञस्य॑ दे॒वमृ॒त्विज॑म् । होता॑रं रत्न॒धात॑मम् ॥


इसमें पदों को अलग करके क्रम से उनको पढा जाता है

अ॒ग्निम् । ई॒ळे॒ । पु॒रःऽहि॑तम् । य॒ज्ञस्य॑ । दे॒वम् । ऋ॒त्विज॑म् । होता॑रम् । र॒त्न॒ऽधात॑मम् ॥


पदक्रम- १ २ | २ ३| ३ ४| ४ ५| ५ ६
क्रम पाठ करने के लिए पहले पदों को गिनकर पहला पद दूसरे पद के साथ, दूसरा तीसरे पद के साथ, तीसरा चौथे पद के साथ इस तरह से पढा जाता है :---

अ॒ग्निम् ई॒ळे॒| ई॒ळे॒ पु॒रःऽहि॑तम् |  पु॒रःऽहि॑तम् य॒ज्ञस्य॑ |
य॒ज्ञस्य॑ दे॒वम्| दे॒वम् ऋ॒त्विज॑म्| ऋ॒त्विज॑म् होता॑रम्|
होता॑रम् र॒त्न॒ऽधात॑मम्||

============


पदक्रम -   १ २| २ १| १ २|
                २ ३| ३ २| २ ३|
                ३ ४| ४ ३| ३ ४|
                ४ ५| ५ ४| ४ ५|
                ५ ६| ६ ५| ५ ६|
                ६ ७| ७ ६| ६ ७|
 जैसे-      अ॒ग्निम् ई॒ळे॒|  ई॒ळे॒ अ॒ग्निम्| अ॒ग्निम् ई॒ळे॒| ई॒ळे॒ पु॒रःऽहि॑तम्| पु॒रःऽहि॑तम् ई॒ळे॒| ई॒ळे॒ पु॒रःऽहि॑तम्| पु॒रःऽहि॑तम् य॒ज्ञस्य॑| य॒ज्ञस्य॑ पु॒रःऽहि॑तम्| पु॒रःऽहि॑तम् य॒ज्ञस्य॑| य॒ज्ञस्य॑ दे॒वम्| दे॒वम् य॒ज्ञस्य॑| य॒ज्ञस्य॑ दे॒वम्| य॒ज्ञस्य॑ दे॒वम्| दे॒वम् य॒ज्ञस्य॑| य॒ज्ञस्य॑ दे॒वम्| दे॒वम् ऋ॒त्विज॑म्| ऋ॒त्विज॑म् दे॒वम्| दे॒वम् ऋ॒त्विज॑म्| ऋ॒त्विज॑म् होता॑रम्| होता॑रम् ऋ॒त्विज॑म्|      ऋ॒त्विज॑म् होता॑रम्| होता॑रम् र॒त्न॒ऽधात॑मम्| र॒त्न॒ऽधात॑मम् होता॑रम्| होता॑रम् र॒त्न॒ऽधात॑मम्||


जिस तरह  पांच छह फूलो को लेकर माला गूथी जाती है सेम उसी तरह इसमे क्रम बनता है
पदक्रम-  १ २ ६ ५|
              २ ३ ५ ४|
              ३ ४ ४ ३|
              ४ ५ ३ २|
              ५ ६ २ १|

  अ॒ग्निम् ई॒ळे॒ र॒त्न॒ऽधात॑मम् होता॑रम् | ई॒ळे॒ पु॒रःऽहि॑तम् होता॑रम् ऋ॒त्विज॑म्| पु॒रःऽहि॑तम् य॒ज्ञस्य॑ य॒ज्ञस्य॑ पु॒रःऽहि॑तम्|....
  इस तरह से


पदक्रम-  १ २| २ १ | १ २ ३| 
              २ ३| ३ २ | २ ३ ४|
              ३ ४| ४ ३ | ३ ४ ५|
              ४ ५| ५ ४ | ४ ५ ६|
              
     
यह क्रम पाठ की तरह ही होता है।       
पदक्रम-  १ २ २ ३ ३ ४ 
              ३ ४ २ ३ १ २|
              ४ ५ ५ ६ ६ ७
              ६ ७ ५ ६ ४ ५|  

    
पदक्रम- १ २| २ १| १ २| २ ३ | ३ २ १||     
             २ ३| ३ २| २ ३| ३ ४ | ४ ३ २||
             इस तरह से
             
        
पदक्रम-   १ २ ४ ५| 
               १ २ ५ ४|
               १ २ २ ३|
               ४ ५ ५ ४|
               ३ ४ ६ ७|
               ३ ४ ७ ६|
               ३ ४ ४ ५|  इत्यादि
               

पदक्रम- १ २| २ १| १ २ ३| ३ २ १| 
             १ २ ३| २ ३| ३ २| २ ३ ४| ४ ३ २|
             २ ३ ४| ३ ४| ४ ३| ३ ४ ५| ५ ४ ३| इत्यादि


       पदक्रम-  १ २  २ १  १ २| २ ३ ४  ४ ५ २   २ ३  ३ ४ इत्यादि

मित्रों ! इस तरह से ११ तरह के पाठ है जिनका गुरुकुल मे
ब्रह्मचारी पाठ करते हैं । इससे वेद मन्त्र सुनने मे कर्णप्रिय लगते हैं और विद्यार्थी मन्त्रों को याद भी कर लेते  हैं।

जब विदेशी मुसलमान आक्रान्ताओं ने भारत के गुरुकुल नष्ट करने शुरु किये तो विद्वान् ब्राह्मणों ने  बहुत कष्ट सहकर वेदों के पाठ को आज तक सुरक्षित रखा। इसलिए वेदों में आज तक कोई मिलावट नही हो पायी।

जो दो वेद पढे, उसे द्विवेदः (द्विवेदी), जो तीन तरह के पाठ का अभ्यास करते हैं, उनको त्रिपाठी । तीन वेद को पढ़ने वाले को त्रिवेदः (त्रिवेदी) । जो चारों वेद पढे, उनको  चतुर्वेदः (चतुर्वेदी) कहते हैं ।  इस तरह से उस समय उपाधि दी जाती थी। संकलनकर्ता :-- योगाचार्य डॉक्टर प्रवीण कुमार शास्त्री

 आज भी जो लोग इन उपाधि को लगाते हैं, उनके पूर्वज वैसे ही वेदपाठ करते थे, किंतु आजकल यह लोग केवल नाम मात्र की उपाधि लगाते हैं । वेदों के पाठ को नहीं जानते हैं ।

Sunday, 28 June 2020

सुखी परिवार का रहस्य

===================

अनुव्रतः पितुः पुत्रो मात्रा भवतु  संमनाः । जाया पत्ये मधुमतीं वाचं वदतु शन्तिवाम् ।। (अथर्ववेद ३/३०/२)

पुत्र पिता के अनुकूल कर्म करने वाला हो और माता के साथ समान मनवाला हो । पत्नी पति से मधुर और सुखद वाणी बोले । 

Thursday, 25 June 2020

वेदों की सम्पूर्ण जानकारी

!!!---: ऋग्वेदः---!!!
==============

www.facebook.com/vaidiksanskrit

लेखक --- योगाचार्य डॉ. प्रवीण कुमार शास्त्री

 ऋग्वेद की इक्कीस शाखाएँ हैं- एकविंशतिधा बाह्वृच्यम्। इनमें से उपलब्ध पाँच शाखाएँ हैं ---शाकल, बाष्कल, आश्वलायन, शांखायन और माण्डूकायन।  

"ऋक्" का अर्थ हैः--स्तुतिपरक-मन्त्र। "ऋच्यते स्तूयतेऽनयाया इति ऋक्।" 
जिन मन्त्रों के द्वारा देवों की स्तुति की जाती है, उन्हें ऋक् कहते हैं। 


ऋग्वेद में विभिन्न देवों की स्तुति वाले मन्त्र हैं, अतः इसे ऋग्वेद कहा जाता है। इसमें मन्त्रों का संग्रह है, इसलिए इसे "संहिता" कहा जाता है। संहिता सन्निकट वर्णों के लिए भी कहा जाता है, ऐसा पाणिनि का मानना हैः--"परः सन्निकर्षः संहिता।" (अष्टाध्यायी--१/४/१०९)  लेखक --- योगाचार्य डॉ. प्रवीण कुमार शास्त्री

 ========================

ऋक् भूलोक है, (अग्नि देवता प्रधान)।
 यजुः अन्तरिक्ष-लोक है, (वायु-देवता-प्रधान)।
 साम द्युलोक है। (सूर्य-देवता-प्रधानः---"अयं (भूः) ऋग्वेदः।" (षड्विंश-ब्राह्मणः--१/५) 

 अत एव अग्नि से ऋग्वेद, वायु से यजुर्वेद, आदित्य से सामवेद और अङ्गिरा से अथर्ववेद की उत्पत्ति बताई गई है।  लेखक --- योगाचार्य डॉ. प्रवीण कुमार शास्त्री

इस प्रकार कहा जा सकता है कि तीनों वेदों में तीनों लोकों का समावेश है।   यजुर्वेद में इसकी व्याख्या दूसरे प्रकार से की गई हैः--ऋग्वेद वाक्-तत्त्व (ज्ञान-तत्त्व या विचार-तत्त्व) का संकलन है। यजुर्वेद में मनस्तत्त्व (चिन्तन, कर्मपक्ष, कर्मकाण्ड, संकल्प) का संग्रह है तथा सामवेद प्राणतत्त्व (आन्तरिक-ऊर्जा, संगीत, समन्वय) का संग्रह है। इन तीनों तत्त्वों के समन्वय से ब्रह्म की प्राप्ति होती हैः---  "ऋचं वाचं प्रपद्ये मनो यजुः प्रपद्ये साम प्रपद्ये।" (यजुर्वेदः--३६/१)  लेखक --- योगाचार्य डॉ. प्रवीण कुमार शास्त्री

 ब्राह्मण-ग्रन्थों में इसकी अन्य प्रकार से व्याख्या की गई हैः--- 
(क) ऋग्वेद ब्रह्म हैः---"ब्रह्म वा ऋक्" (कौषीतकि- ७/१०)
 (ख) ऋग्वेद वाणी है----"वाक् वा ऋक्" (जैमिनीय-ब्राह्मण--४/२३/४)। 
(ग) ऋग्वेद प्राण हैः--"प्राणो वा ऋक्" (शतपथः--७/५/२/१२)
(घ) ऋग्वेद अमृत हैः--"अमृतं वा ऋक्" (कौषीतकि--७/१०)।
(ङ) ऋग्वेद वीर्य हैः--"वीर्यं वै देवता--ऋचः" (शतपथ---१/७/२/२०)  

================

यज्ञों के चार प्रकार के ऋत्विक् होते हैंः--
(क) होता, (ख) अध्वर्यु, (ग) उद्गाता, (घ) ब्रह्मा । 

इसका वर्णन ऋग्वेद में आया हैः---  "ऋचां त्वः पोषमास्ते पुपुष्वान् गायत्रं त्वो गायति शक्वरीषु। ब्रह्मा त्वो वदति जातविद्यां यज्ञस्य मात्रां विमिमीत उत्वः।।" (ऋग्वेदः--१०/७१/११)  

(१.) होताः---होता ऋग्वेद का ऋत्विक् है। यह यज्ञ में ऋग्वेद के मन्त्रों का पाठ करता है। ऐसी देवस्तुति वाली ऋचाओं का पारिभाषिक नाम "शस्त्र" है। इसका लक्षण हैः--"अप्रगीत-मन्त्र-साध्या स्तुतिः शस्त्रम्।" अर्थात् गान-रहित देवस्तुति-परक मन्त्र को "शस्त्र" कहते हैं।  

(२.) अध्वर्युः---अध्वर्यु का सम्बन्ध यजुर्वेद से है। यह यज्ञ के विविध कर्मों का निष्पादक होता है। यह प्रमुख ऋत्विक् है। यज्ञ में घृताहुति-आदि देना इसी का कर्म है।

 (३.) उद्गाताः---उद्गाता सामवेद का प्रतिनिधि ऋत्विक् है। यह यज्ञ में देवस्तुति में सामवेद के मन्त्रों का गान करता है। 

(४.) ब्रह्माः---ब्रह्मा अथर्ववेद का ऋत्विक् है। यह यज्ञ का अधिष्ठाता और संचालक होता है। इसके निर्देशानुसार ही अन्य ऋत्विक् कार्य करते हैं। यह चतुर्वेद-विद् होता है। यह त्रुटियों का परिमार्जन, निर्देशन, यज्ञिय-विधि की व्याख्या आदि करता है। लेखक --- योगाचार्य डॉ. प्रवीण कुमार शास्त्री

 ===============

 पतञ्जलि ऋषि ने ऋग्वेद की २१ शाखाओं काउल्लेख किया हैः--"एकविंशतिधा बाह्वृच्यम्।" (महाभाष्य--पस्पशाह्निक)। 

इसमें से सम्प्रति पाँच शाखाओं के नाम उपलब्ध होते हैंः---(१.) शाकल, (२.) बाष्कल, (३.) आश्वलायन, (४.) शांखायन और (५.) माण्डूकायन। लेखक --- योगाचार्य डॉ. प्रवीण कुमार शास्त्री

  (१.) शाकलः--सम्प्रति यही शाखा उपलब्ध है। इसी का वर्णन विस्तार से आगे किया जाएगा। 

 (२.) बाष्कलः--यह शाखा उपलब्ध नहीं है। शाकल में १०१७ सूक्त हैं, परन्तु बाष्कल में १०२५ सूक्त थे, अर्थात् ८ सूक्त अधिक थे। इन ८ सूक्तों का शाकल में संकलन कर लिया गया है। एक "संज्ञान-सूक्त" के रूप में और शेष ७ सूक्त "बालखिल्य" के रूप में समाविष्ट कर लिया गया है। ये ७ सूक्त प्रथम ७ सूक्तों में सम्मिलित किया गया है।  लेखक --- योगाचार्य डॉ. प्रवीण कुमार शास्त्री

 (३.) आश्वलायनः--इस शाखा की संहिता और ब्राह्मण उपलब्ध नहीं है, किन्तु श्रौतसूत्र और गृह्यसूत्र उपलब्ध है। 

 (४.) शांखायनः---यह शाखा उपलब्ध नहीं है, किन्तु इसके ब्राह्मण, आरण्यक, श्रौत और गृह्यसूत्र उपलब्ध हैं। 

 (५.) माण्डूकायनः--इस शाखा का कोई भी साहित्य उपलब्ध नहीं है।  

 =================

 ऋग्वेद का विभाजन दो प्रकार से किया जाता हैः---(१.) अष्टक, अध्याय, वर्ग और मन्त्र। (२.) मण्डल, अनुवाक, सूक्त और मन्त्र। 

 (१.) अष्टक-क्रमः--इसमें आठ अष्टक हैं, प्रत्येक अष्टक में आठ-आठ अध्याय हैं, जिनकी कुल संख्या ६४ (चौंसठ) है। प्रत्येक अध्याय में वर्ग है, किन्तु इनकी संख्या समान नहीं है। कुल वर्ग २०२४ है, सूक्त २०२८ बालखिल्य सहित है।   लेखक --- योगाचार्य डॉ. प्रवीण कुमार शास्त्री

 (२.) मण्डलक्रमः----यह विभाजन अधिक सुसंगत और उपयुक्त हैं। इसके अनुसार ऋग्वेद में कुल १० मण्डल हैं। इसमें बालखिल्य के ११ सूक्तों के ८० मन्त्रों को सम्मिलित करते हुए ८५ अनुवाक, १०२८ सूक्त और १०,५५२ मन्त्र हैं। जब कभी ऋग्वेद का पता देना हो तब अनुवाक की संख्या छोड देते हैं। सन्दर्भ में मण्डल, सूक्त और मन्त्र-संख्या ही देता हैं, जैसेः---ऋग्वेदः--१०/७१/११  इसमें अनुवाक सम्मिलित नहीं है। लेखक --- योगाचार्य डॉ. प्रवीण कुमार शास्त्री

ऋग्वेद के प्रत्येक मण्डल में सूक्तों की संख्याः-- 

प्रथम-मण्डलः---१९१,
 द्वितीय---४३
तृतीयः--६२
चतुर्थः---५८
पञ्चमः---८७
षष्ठः---७५
सप्तमः--१०४
अष्टमः---१०३
नवमः---११४
दशमः---१९१

ऋग्वेद में १० मण्डल, ८५ अनुवाक, १०२८ सूक्त हैं ।  

===========
प्रथम-मण्डलः--२४,
 द्वितीयः---०४, 
तृतीयः---०५
चतुर्थः---०५
पञ्चमः---०६
षष्ठ---०६
सप्तमः--०६
अष्टमः--१०
नवमः--०७
दशमः---१२
इस प्रकार ऋग्वेद में कुल अनुवाक ८५ हैं।  

ऋग्वेद के प्रत्येक मण्डल में सूक्तों की संख्याः-- 
प्रथम-मण्डलः---१९१
द्वितीय---४३
तृतीयः--६२
चतुर्थः---५८
पञ्चमः---८७
षष्ठः---७५
सप्तमः--१०४
अष्टमः---१०३
नवमः---११४
दशमः---१९१
इस प्रकार ऋग्वेद में कुल सूक्त १०२८ हैं।  

==================

श्रद्धासूक्त, पुरुष-सूक्त, यम-यमी-सूक्त, उर्वशी-पुरुरवा-सूक्त, नासदीय-सूक्त, वाक्-सूक्त, हिरण्यगर्भ-सूक्त, दान-सूक्त, सरमा-पणि-सूक्त, औषधि-सूक्त, विश्वामित्र-नदी-सूक्त आदि-आदि।  

ऋग्वेद में कुल मन्त्रों की संख्या १०,५८०, कुल शब्द १५३८२६ और कुल अक्षर ४३,२००० हैं।  

पतञ्जलि मुनि ने ऋग्वेद की २१ शाखाओं का उल्लेख किया है। इनमें से पाँच शाखाओं के नाम उपलब्ध हैः--शाकल, बाष्कल, शांखायन, माण्डूकायन औऱ आश्वलायन। 

इन पाँच शाखाओं में से केवल एक शाखा उपलब्ध हैः--शाकल-शाखा। बाष्कल-शाखा में १०,६२२ मन्त्र हैं । 

ऋग्वेद के दो ब्राह्मण हैं---
ऐतरेय और कौषीतकि (शांखायन) । 
ऋग्वेद के आरण्यक को ऐतरेय कहते हैं, इसमें पाँच आरण्यक और अठारह अध्याय हैं।  

 ==============

ऋग्वेद के ऋषि और मण्डल निम्न हैः--- 
मण्डल-------सूक्तसंख्याः------मन्त्र-संख्याः----ऋषिनाम
 (१.)प्रथम-----१९१--------------२००६--------मधुच्छन्दाः, मेधातिथिः, दीर्घतमा,अगस्त्य, गौतम, पराशर,

 (२.) द्वितीय—--४३----------------४२९---------गृत्समद और उनके वंशज 

(३.) तृतीय----६२-----------------६१७--------विश्वामित्र और उनके वंशज
 (४.) चतुर्थ-----५८------------------५८९------वामदेव और उनके वंशज 

(५.) पञ्चम----८७------------------७२७------अत्रि और उनके वंशज
 (६.) षष्ठ-------७५ ----------------७६५------भरद्वाज और उनके वंशज 
(७.) सप्तम----१०४-----------------८४१------वशिष्ठ और उनके वंशज 
(८.) अष्टम-----१०३----------------१७१६----कण्व, भृगु, अंगिरस् और उनके वंशज

 (९.) नवम-------११४----------------११०८-----अनेक ऋषि
(१०.) दशम-----१९१-----------------१७५४----

त्रित, विमद, इन्द्र, श्रद्धा-कामायनी, इन्द्राणी, शची, उर्वशी  मन्त्र-द्रष्टा ऋषिकाएँ ------
 -------------------------------------- 

ऋग्वेद में २४ मन्त्र-द्रष्टा ऋषिकाएँ हैं। इनके द्वारा दृष्ट मन्त्रों की संख्या २२४ है।  

ऋषिका---------------मन्त्रसंख्या-------------सन्दर्भ
 (१.) सूर्य सावित्री-------४७-----------------१०/८५ 
(२.) घोषा काक्षीवती----२८--------------१०/३९-४०
 (३.) सिकता निवावरी---२०-----------------९/८६
 (४.) इन्द्राणी-------------१७---------------१०/८६,१४५
(५.) यमी वैवस्वती------११------------१०/१०,१५४ 
(६.) दक्षिणा प्राजापत्या—११----------------१०/१०७ 
(७.) अदिति----------------१०---------------4४/१८, १०/७२ 
(८.) वाक् आम्भृणी-------८------------------१०/१२५ 
(९.) अपाला आत्रेयी-------७-------------------८/९१
 (१०.) जुहू ब्रह्मजाया-----७-------------------१०/१०९ 
(११.) अग्स्त्यस्वसा-------६--------------------१०/६० 
(१२.) विश्ववारा आत्रेयी---६---------------------5.28 
(१३.) उर्वशी-----------------६--------------------10.95 
(१४.) सरमा देवशुनी--------६--------------------१०/१०८
(१५.) शिखण्डिन्यौ अप्सरसौ—६-----------------९/१०४ 
(१६.) श्रद्धा कामायनी----------५-----------------१०/१५१
(१७.) देवजामयः-----------------5----------------१०/१५३
 (१८.) पौलोमी शची--------------६---------------१०/१५९
(१९.) नदी------------------------४------------------३/३३ 
(२०.) सार्पराज्ञी--------------------३---------------१०/१८९
(२१.) गोधा-----------------------१-----------------१०/१३४
(२२.) शश्वती आंगिरसी-----------१-----------------८/१
 (२३.) वसुक्रपत्नी------------------१---------------१०/२८ 
(२४.) रोमशा ब्रह्मवादिनी---------१.------------१/१२६  

 ================

ऋग्वेद में कुल २० छन्दों का प्रयोग हुआ है। इनमें से ७ छन्दों का मुख्य रूप से प्रयोग हुआ है। ये हैं---- 
(१.) गायत्री (२४ अक्षर),  
(२.) उष्णिक् (२८अक्षर), 
(३.) अनुष्टुप् (३२ अक्षर), 
(४.) बृहती (३६ अक्षर),
(५.) पंक्ति (४० अक्षऱ), 
(६.) त्रिष्टुप् (४४ अक्षर), 
(७.) जगती (४८ अक्षर), 

इनमें से त्रिष्टुप्, गायत्री, जगती और अनुष्टुप् छन्दों का सर्वाधिक प्रयोग हुआ है। 

इनका विवरणः---- 
छन्दनाम----------मन्त्र-संख्या-------------अक्षर-संख्या 
(१.) त्रिष्टुप्---------४२५८-------------------१,८७,३१२ 
(२.) गायत्री--------२४५६-------------------५८,९३८ 
(३.) जगती---------१३५३-------------------६४,९४४ 
(४.) अनुष्टुप्---------८६०--------------------२७,५२०
(५.) पंक्ति-------------४९८ 
(६.) उष्णिक्-----------३९८ 
(७.) बृहती---------------३७१

इस प्रकार ऋग्वेद के लगभग ८०% प्रतिशत मन्त्र इन्हीं छन्दों में है। अन्य छन्दों का विवरण इस प्रकार हैः---- 

छन्दनाम--------------अक्षर------------------मन्त्र 
(८.) अतिजगती-------५२--------------------१७ 
(९.) शक्वरी-----------५६--------------------१९ 
(१०.) अतिशक्वरी-----६०-------------------१०
(११.) अष्टि-------------६४--------------------०७ 
(१२.) अत्यष्टि-----------६८-------------------८२ 
(१३.) धृति---------------७२-------------------०२ 
(१४.) अतिधृति-----------७६------------------०१
(१५.) द्विपदा गायत्री-------१६-----------------०३
(१६.) द्विपदा विराट्--------२०---------------१३९ 
(१७.) द्विपदा त्रिष्टुप्---------२२-----------------१४ 
(१८.) द्विपदा जगती---------२४-------------------०१ 
(१९.) एकपदा विराट्---------१०------------------०५ 
(२०.) एकपदा त्रिष्टुप्---------११-----------------०१  

वेदों को स्वरूप के आधार पर तीन भागों में बाँटा गया हैः—पद्य, गद्य और गीति। मीमांसाकार जैमिनि के इसका उल्लेख किया है।  लेखक --- योगाचार्य डॉ. प्रवीण कुमार शास्त्री

(१.) जिन मन्त्रों में अर्थ के आधार पर पाद (चरण) की व्यवस्था है और पद्यात्मक है, उन्हें ऋक् या ऋचा कहते हैं। ऐसे संकलन को ऋग्वेद कहते हैं----”तेषाम् ऋक् यत्रार्थवशेन पादव्यवस्था।” (जैमिनीय सूत्र—२/१/३५)  

(२.) जिन ऋचाओं का गान होता है और जो गीति रूप है, उन्हें साम कहते हैं। ऐसे मन्त्रों का संकलन सामवेद में किया गया हैः----”गीतिषु सामाख्या।” (पूर्वमीमांसा---२/१/३६) 

 (३.) जो मन्त्र पद्य और गान से रहित है अर्थात् गद्य रूप हैं, उन्हें यजुष् कहते हैं। ऐसे मन्त्रों का संकलन यजुर्वेद में हैं----”शेषे यजुः शब्दः।” (पूर्वमीमांसा—२/१/३७) 

 (४.) अथर्ववेद में पद्य और गद्य दोनों का संकलन हैं, अतः वह इन्हीं तीन भेद के अन्तर्गत आ जाता है।  इस भेदत्रय के कारण वेदों को ”वेदत्रयी” कहते हैं। वेदत्रयी का भाव है-- वेदों की त्रिविध रचना।  लेखक --- योगाचार्य डॉ. प्रवीण कुमार शास्त्री

 ===============

 ”खिल” से अभिप्राय है—परिशिष्ट या प्रक्षिप्त। जो अंश या मन्त्र मूल ग्रन्थ में न हो और आवश्यकतानुसार अन्यत्र से संग्रह किया गया हो, उसे खिल कहते हैं। इस समय सम्पूर्ण विश्व ऋग्वेद की बाष्कल शाखा प्रसिद्ध है। शाकल शाखा में कुछ अधिक मंन्त्र थे। जो इस समय उपलब्ध नहीं है, किन्तु उनके कुछ मन्त्र बाष्कल में परिशिष्ट के रूप में गृहीत हैं।  मैक्समूलर के संस्करण में ३२ तथा ऑफ्रेख्त के संस्करण में २५ खिल सूक्त हैं। सातवलेकर की ऋक्संहिता में ३६ खिल सूक्त हैं।   प्रो. रॉठ की प्रेरणा से डॉ. शेफ्टेलोवित्स ने एक खिल-सूक्त-संग्रह १९०६ में ब्रेस्लाड (जर्मनी) से प्रकाशित करवाया। तदनन्तर पूना से सायण ऋग्वेद-भाष्य के प्रकाशित किया गया। चिन्तामणि गणेश काशीकर ने खिल सूक्तों पर विस्तृत विवेचन किया है। ५ अध्यायों में ८६ खिल सूक्तों का पाठभेद आदि के साथ इसका विवरण यहाँ प्रस्तुत हैः---  

अध्याय----सूक्त------मन्त्रसंख्या----------विशिष्ट सूक्त
 (१.) ------१२----------८६-------------------सौपर्ण सूक्त (११ सूक्त. ८४ मन्त्र) 

(२.) -------१६----------६६+७० (अन्य)------श्रीसूक्त (१९+२१=४० मन्त्र) 

(३.) -------२२---------१३७+२५ (अन्य)------बालखिल्य (८ सूक्त, ६६ मन्त्र) 

(४.) -------१४----------१०५+६० (अन्य)------शिवसंकल्प (२८ मन्त्र), 

(५.) --------२२----------३७०+९ (अऩ्य)-------निविद् १९३, प्रैष ६४, कुन्ताप ८० मन्त्र) इस प्रकार कुल सूक्त ८६ और कुल मन्त्र ९२९ हैं। 

 !!!---: यजुर्वेद :---!!! 
=======================  

=====================  

यजुष् का अर्थ हैः---(१.) “यजुर्यजतेः” (निरुक्त—७/१२) अथार्त् यज्ञ से सम्बद्ध मन्त्रों को यजुष् कहते हैं।   

(२.) ”इज्यतेऽनेनेति यजुः।” अर्थात् जिन मन्त्रों से यज्ञ किया जाता है, उन्हें यजुष् कहते हैं। यजुर्वेद का कर्मकाण्ड से साक्षात् सम्बन्ध है। इसका ऋत्विक् अध्वर्यु होता है, अतः इसे ”अध्वर्युवेद” भी कहा जाता है। यह अध्वर्यु ही यज्ञ के स्वरूप का निष्पादक होता हैः---”अध्वर्युनामक एक ऋत्विग् यज्ञस्य स्वरूपं निष्पादयति। अध्वरं युनक्ति, अध्वरस्य नेता।” (सायणाचार्य-ऋग्भाष्यभूमिका)   

(३.) ”अनियताक्षरावसानो यजुः” अर्थात् जिन मन्त्रों में पद्यों के तुल्य अक्षर-संख्या निर्धारित नहीं होती, वे यजुः हैं।  

(४.) ”शेषे यजुःशब्दः” (पूर्वमीमांसा—२/१/३७) अर्थात् पद्यबन्ध और गीति से रहित मन्त्रात्मक रचना को यजुष् कहते हैं। इसका अभिप्राय यह भी है कि सभी गद्यात्मक मन्त्र-रचना यजुः की कोटि में आती है।   लेखक --- योगाचार्य डॉ. प्रवीण कुमार शास्त्री

(५.) ”एकप्रयोजनं साकांक्षं पदजातमेकं यजुः” अर्थात् एक उद्देश्य से कहे हुए साकांक्ष एक पद-समूह को यजुः कहते हैं। इसका अभिप्राय यह है कि एक सार्थक वाक्य यजुः की एक इकाई माना जाता है।   तैत्तिरीय-संहिता के भाष्य की भूमिका में सायण ने यजुर्वेद का महत्त्व बताते हुए कहा है कि यजुर्वेद-भित्ति (दीवार) है और अन्य वेद (ऋक् और साम) चित्र है। इसलिए यजुर्वेद सबसे मुख्य है। यज्ञ को आधार बनाकर ही ऋचाओं का पाठ और सामगान होता हैः----”भित्तिस्थानीयो यजुर्वेदः, चित्रस्थानावितरौ। तस्मात्कर्मसु यजुर्वेदस्यैव प्राधान्यम्।” (सायण)

---------------------------------------- 

ब्राह्मण-ग्रन्थों में यजुर्वेद का दार्शनिक रूप प्रस्तुत किया गया है।

 (१.) यजुर्वेद विष्णु का रूप है, अर्थात् इसमें विष्णु (परमात्मा) के स्वरूप का वर्णन हैः---”यजूंषि विष्णुः” (शतपथ—४/६/७/३)

(२.) यजुर्वेद प्राणतत्त्व और मनस्तत्त्व का वर्णन करता है। अतः वह प्राण है, मन हैः---”प्राणो वै यजुः” (शतपथ—१४/८/१४/२) । ”मनो यजुः” (शतपथ---१४/४/३/१२)

(३.) यजुर्वेद में वायु व अन्तरिक्ष का वर्णन है। अतः वह अन्तरिक्ष का प्रतिनिधि हैः--”अन्तरिक्षलोको यजुर्वेदः” (षड्विंश-ब्राह्मण—१/५)

(४.) यजुर्वेद तेजस्विता का उपदेश देता है। अतः वह महः (तेज) हैः--”यजुर्वेद एव महः” (गोपथ-ब्राह्मण, पूर्व---५/१५)

(५.) यजुर्वेद क्षात्र-धर्म और कर्मठता की शिक्षा देता है। अतः वह क्षत्रियों का वेद हैः--”यजुर्वेदं क्षत्रियस्याहुर्योनिम्।” (तैत्तिरीय-ब्राह्मण---३/१२/९/२)  

 ==============

यजुर्वेद मुख्य रूप से दो भागों में विभक्त है---

(१.) शुक्लयजुर्वेद (२.) कृष्णयजुर्वेद। यजुर्वेद के दो सम्प्रदाय प्रचलित हैं---(१.) आदित्य-सम्प्रदाय (२.) ब्रह्म-सम्प्रदाय। लेखक --- योगाचार्य डॉ. प्रवीण कुमार शास्त्री

शुक्लयजुर्वेद आदित्य-सम्प्रदाय से सम्बद्ध है और कृष्णयजुर्वेद ब्रह्म-सम्प्रदाय से। शतपथ-ब्राह्मण में इसका उल्लेख हुआ है कि शुक्लयजुर्वेद आदित्य-सम्प्रदाय से सम्बन्धित है और इसके आख्याता याज्ञवल्क्य हैं----”आदित्यानीमानि शुक्लानि यजूंषि। वाजसनेयेन याज्ञवल्क्येन आख्यायन्ते।” (शतपथ—१४/९/४/३३)  लेखक --- योगाचार्य डॉ. प्रवीण कुमार शास्त्री

शुक्लयजुर्वेद को ही वाजसनेयि-संहिता और माध्यन्दिन-संहिता भी कहते हैं। याज्ञवल्क्य इसके ऋषि हैं। वे मिथिला के निवासी थे। इनके पिता वाजसनि थे, इसलिए याज्ञवल्क्य वाजसनेय कहलाते थे। वाजसनेय से सम्बद्ध संहिता ”वाजसनेयि-संहिता” कहलाई। याज्ञवल्क्य ने मध्याह्न के सूर्य के समय अपने आचार्य वैशम्पायन से इस वेद का ज्ञान प्राप्त किया था, इसलिए इस ”माध्यन्दिन-संहिता” भी कहते हैं।   लेखक --- योगाचार्य डॉ. प्रवीण कुमार शास्त्री

======

शुक्ल और कृष्ण भेदों का आधार यह है कि शुक्ल यजुर्वेद में यज्ञों से सम्बद्ध विशुद्ध मन्त्रात्मक भाग ही है। इसमें व्याख्या, विवरण और विनियोगात्मक भाग नहीं है। ये मन्त्र इसी रूप में यज्ञों में पढे जाते हैं। विशुद्ध और परिष्कृत होने के कारण इसे शुक्ल (स्वच्छ, श्वेत, अमिश्रित) यजुर्वेद कहा जाता है। इस शुक्लयजुर्वेद की एक अन्य शाखा काण्व-शाखा है।  

कृष्णयजुर्वेद का सम्बन्ध ब्रह्म-सम्प्रदाय से है। इसमें मन्त्रों के साथ व्याख्या और विनियोग वाला अंश भी मिश्रित है। अतः इसे कृष्ण (अस्वच्छ, कृष्ण, मिश्रित) यजुर्वेद कहते हैं। 

इसी आधार पर शुक्लयजुर्वेद के पारायणकर्ता ब्राह्मणों को ”शुक्ल” और कृष्णयजुर्वेद के पारायणकर्ता ब्राह्मणों को ”मिश्र” नाम दिया गया है।  लेखक --- योगाचार्य डॉ. प्रवीण कुमार शास्त्री

 गुरु वैशम्पायन ने अपने शिष्यों को दोनों प्रकार के यजुर्वेद का अध्ययन कराया था। इन्हीं का एक शिष्य तित्तिरि थे, जिन्होंने कृष्णयजुर्वेद का अध्ययन किया था, किन्तु इन्होंने अपनी एक पृथक् शाखा बना ली। उनके नाम से ही तैत्तिरीय-शाखा कहलाई । 

मैत्रेय ने कृष्णयजुर्वेद की अपनी एक पृथक् शाखा चलाई, जिसका नाम मैत्रायणी पडा। इसी प्रकार कठ और कपिष्ठल भी कृष्णयजुर्वेद की पृथक्-२ शाखाएँ हैं।   

(१.) महर्षि पतञ्जलि ने महाभाष्य के पस्पशाह्निक में यजुर्वेद की १०१ शाखा का उल्लेख किया हैः--“एकशतमध्वर्युशाखाः”।  लेखक --- योगाचार्य डॉ. प्रवीण कुमार शास्त्री

(२.) षड्गुरुशिष्य ने सर्वानुक्रमणी की वृत्ति में १०० शाखाओं का उल्लेख किया है---”यजुरेकशताध्वकम्।” (सर्वानुक्रमणी)। 

(३.) कूर्मपुराण में भी १०० शाखाओं का उल्लेख प्राप्त होता है---”शाखानां तु शतेनाथ यजुर्वेदमथाकरोत्।” (कूर्मपुराण—४९/५१)

(४.) इसके विपरीत ”चरणव्यूह” में यजुर्वेद की केवल ८६ शाखाओं का ही उल्लेख प्राप्त होता है। उसके अनुसार 
(क) चरकशाखा की १२, 
(ख) मैत्रायणी की ७, 
(ग) वाजसनेय की १७, 
(घ) तैत्तिरीय की ६, और 
(ङ) कठ की ४४ शाखाएँ हैं---”यजुर्वेदस्य षढशीतिर्भेदाः, चरका द्वादश, मैत्रायणीयाः सप्त, वाजसनेयाः सप्तदश, तैत्तिरीयकाः षट्, कठानां चतुश्चत्वारिंशत्.” (चरणव्यूह—२)

इस निर्देश से ऐसा प्रतीत होता है कि यजुर्वेद की शाखाएँ क्रमशः लुप्त होती जा रही थीं और चरणव्यूह के समय में केवल ४२ शाखाएँ ही उपलब्ध थीं । कठ-शाखा के ४४ ग्रन्थों एवं उनके लेखकों के नाम भी लुप्त हो चुके थे। सम्प्रति केवल ६ शाखाएँ ही यजुर्वेद की उपलब्ध हैं। दो शुक्ल की और ४ कृष्ण यजुर्वेद की।   लेखक --- योगाचार्य डॉ. प्रवीण कुमार शास्त्री

 -------------------- 

इसकी दो शाखाएँ उपलब्ध हैं---(१.) वाजसनेयि और (२.) काण्व। 

(१.) माध्यन्दिन या वाजसनेयि-संहिताः----इस संहिता में ४० अध्याय और १९७५ मन्त्र हैं। इसका ब्राह्मण शतपथ-ब्राह्मण है। इसके अनुसार वाजसनेयि-संहिता में कुल अक्षर २,८८,००० (दो लाख, अठासी हजार) हैं। इस शाखा का प्रचार-प्रसार उत्तर भारत में है। इसका उपनिषद् ईशोपनिषद्, बृहदारण्यकोपनिषद् है।  लेखक --- योगाचार्य डॉ. प्रवीण कुमार शास्त्री

(२.) काण्व-संहिताः---इसमें ४० अध्याय, ३२८ अनुवाक और मन्त्र २०८६ हैं। इसमें माध्यन्दिन की अपेक्षा १११ मन्त्र अधिक हैं। इसके प्रवर्तक ऋषि कण्व हैं। इनके पिता बोधायन और गुरु याज्ञवल्क्य थेः---”बोधायन-पितृत्वाच्च प्रशिष्यत्वाद् बृहस्पतेः। शिष्यत्वाद् याज्ञवल्क्यस्य कण्वोsभून्महतो महान्।।” इस शाखा का प्रचार महाराष्ट्र प्रान्त में अधिक है। प्राचीन काल में इसका प्रचार उत्तर भारत में भी था। महाभारत आदि-पर्व (६३/१८) के अनुसार शकुन्तला के धर्मपिता महर्षि कण्व का आश्रम मालिनी नदी (सम्प्रति बिजनौर जिले में कोटद्वार के पास) था। इस प्रकार देखा जाए तो कण्व का सम्बन्ध उत्तर भारत से रहा है।   

--------------------------

 चरणव्यूह के अनुसार यजुर्वेद की ८६ शाखाओं में से शुक्लयजुर्वेद की १७ और कृष्णयजुर्वेद की ६९ शाखाएँ हैं। कृष्णयजुर्वेद की चार शाखाएँ सम्प्रति उपलब्ध हैं---(१.) तैत्तिरीय, (२.) मैत्रायणी, (३.) काठक (या कठ), (४.) कपिष्ठल 

तैत्तिरीय-शाखा के दो मुख्य भेद हैं---औख्य और खाण्डिकेय। खाण्डिकेय के ५ भेद हैः—आपस्तम्ब, बौधायन, सत्याषाढ, हिरण्यकेशि और लाट्यायन। 

मैत्रायणी के भी ७ भेद हैं और चरक (या कठ) के १२ भेद हैं। कठ के ४४ उपग्रन्थ भी हैं। इसके उपनिषद् कठोपनिषद् और श्वेताश्वतर है।  लेखक --- योगाचार्य डॉ. प्रवीण कुमार शास्त्री

 ------------------------------- 

यह कृष्णयजुर्वेद की प्रमुख शाखा है। इसमें ७ काण्ड, ४४ प्रपाठक और ६३१ अनुवाक हैं। अनुवाकों के भी उपभेद (खण्ड) किए गए हैं। इसलिए जब पता दिया जाता है तो उसमें चार अंक होते हैं। जैसेः---देवा वसव्या अग्ने सोम सूर्य। (तै.सं. कां. २/ प्र.४/अनु.८/खण्ड.१)  

यही एक संहिता है, जिसके सम्पूर्ण ग्रन्थ उपलब्ध हैं। इसका ब्राह्मण (तैत्तिरीय-ब्राह्मण) आरण्यक (तैत्तिरीय-आरण्यक), उपनिषद् (तैत्तिरीय-उपनिषद्), श्रौतसूत्र (बौधायन, आपस्तम्ब, हिरण्यकेशि या सत्याषाढ, वैखानस, भारद्वाज), गृह्यसूत्र (बौधायन, आपस्तम्ब, हिरण्यकेशि,वैखानस, भारद्वाज, अग्निवेश्य), शुल्बसूत्र बौधायन और आपस्तम्ब) और धर्मसूत्र (बौधायन, आपस्तम्ब, हिरण्यकेशि) प्राप्त हैं। इसीलिए यह सर्वांगपूर्ण संहिता है।  तैत्तिरीय-संहिता का विशेष प्रचार दक्षिण भारत में हैं। आचार्य सायण की यही शाखा थी। इसलिए उन्होंने इसी शाखा का सर्वप्रथम भाष्य लिखा।  

 ----------------------------------- 

चरणव्यूह के अनुसार मैत्रायणी-संहिता की सात शाखाएँ हैं---(१.) मानव, (२.) दुन्दुभ, (३.) ऐकेय, (४.) वाराह, (५.) हारिद्रवेय, (६.) श्याम, (७.) श्यामायनीय। मैत्रायणी-संहिता के प्रवर्तक आचार्य मैत्रायण या मैत्रेय थेः----”मैत्रायणी ततः शाखा मैत्रेयास्तु ततः स्मृतः।” (हरिवंशपुराण—अ. ३४)   

इस शाखा में मन्त्र और व्याख्या भाग (ब्राह्मण या गद्यभाग) मिश्रित है। इसमें ४ काण्ड, ५४ प्रपाठक और ३१४४ मन्त्र हैं। इनमें से १७०१ ऋचाएँ ऋग्वेद से उद्धृत हैं। इस संहिता में विभिन्न यागों का विस्तृत वर्णन है।   लेखक --- योगाचार्य डॉ. प्रवीण कुमार शास्त्री

 ------------------------- 

इसे कठ-संहिता भी कहते हैं। यह चरकों की शाखा मानी जाती है। इसमें ५ खण्ड हैं---(१.) इठिमिका, (२.) मध्यमिका, (३.) ओरामिका, (४.) याज्यानुवाक्या, (५.) अश्वमेधादि अनुवचन। इसके उपखण्डों को स्थानक और अनुवचन कहा जाता है। जैनियों ने स्थानक शब्द को अपना लिया। कुल ५ खण्डों में ४० स्थानक और १३ वचन हैं, दोनों को मिलाकर ५३ उपखण्ड हैं। कुल अनुवाक ८४३ और कुल मन्त्र ३०२८ हैं। मन्त्र और ब्राह्मणों की सम्मिलित संख्या १८ हजार है। इसमें १९ प्रमुख यागों का वर्णन है। कभी इस शाखा का ग्राम-ग्राम में प्रचार था। मुनि पतञ्जलि लिखते हैं कि बालक-बालक इस शाखा को जानते थेः---”ग्रामे ग्रामे काठकं कालापकं च प्रोच्यते।” (महाभाष्य—४/३/१०१) आज कल यह शाखा प्रायः लुप्त हो गई है, अर्थात् इसका अधिक प्रचार नहीं है।   लेखक --- योगाचार्य डॉ. प्रवीण कुमार शास्त्री

 ---------------------------------

 प्राचीन काल में कठों की कई शाखाएँ प्रचलित थीं---कठ, प्राच्य कठ और कपिष्ठल कठ। इस शाखा के प्रवर्तक आचार्य थे---कपिष्ठल ऋषि। ये वसिष्ठ गोत्र के थे। इनका निवास स्थान कुरुक्षेत्र के पास कपिष्ठल (कैथल) नामक स्थान है। यह ग्रन्थ अपूर्ण है। यह ग्रन्थ अष्टकों और अध्यायों में विभक्त है। इसके ६ अष्टक उपलब्ध हैं। कुल ४८ अध्याय हैं। 

अतीव परिश्रम से लिखा गया यह लेख आपकी प्रंशसा, टिप्पणी आदि की अपेक्षा रखता है। कृपया अपने विचार अवश्य दें।  


Monday, 22 June 2020

मृत्यु से अभय

====================

जो उस परमब्रह्मा को जान लेता है, वह ब्रह्म ही हो जाता है :----
"स यो हि वै तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति ।"
(मुण्डकोपनिषद् ३/२/९)

इसका अर्थ यह नहीं है कि ईश्वर के गुणों को जानने से व्यक्ति परमात्मा बन जाता है । जीवात्मा परमात्मा के स्वरूप को जानने से उसके गुणों को धारण कर लेता है ।जैसे लोहे के गोले को हम अग्नि में डाल दें तो वह अग्नि रूप हो जाता है । यही स्थिति जीवात्मा की होती है :---

"अकामो धीरो अमृतः स्वयंभू रसेन तृप्तो न कुतश्चनोनः ।
तमेव विद्वान् न विभाय मृत्योरात्मानं धीरमजरं युवानम् ।।" (अथर्ववेद १०/८/४४)


वह परमात्मा कामनाओं से रहित है । जैसे सांसारिक व्यक्तियों की कामनाएं होती है, वैसी उसकी कोई कामना नहीं है । वह धीर है, धैर्यवान् है, अमर है, आनंद अथवा शक्ति से तृप्त है, उसमें कहीं से भी कोई कमी नहीं है । उस धीर अजर, युवा (महाबली) परमात्मा को जानता हुआ मनुष्य मृत्यु से नहीं डरता है ।

अतः वेद भगवान के अनुसार मृत्यु से बचने का एक उपाय यह है कि हम परमात्मा के स्वरूप को समझे । उसे हृदयंगम करने का प्रयत्न करें । प्रश्न यह है कि परमात्मा का स्वरूप क्या है ? महर्षि दयानंद सरस्वती महाराज ने परमात्मा के स्वरूप का वर्णन आर्य समाज के दूसरे नियम ने किया है । वह नियम इस प्रकार है :---"ईश्वर सच्चिदानंद स्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान्, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनंत, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता है ।उसी की उपासना करनी योग्य है। ।

Tuesday, 16 June 2020

वैदिक ऋषिकाएं

!!!---: वैदिक  ऋषिकाएं :---!!!
==================== 

वेद मंत्रों के दर्शन करने वाले विद्वानों को ऋषि कहा जाता है । ऐसे अनेक विद्वान् हुए हैं जिन्होंने वेद मंत्रों का दर्शन किया है । इसी प्रकार से वेदों का दर्शन करने वाली स्त्रियां भी हुई है । जो ऋषिकाएं कही जाती थी । ऐसी कुछ ऋषिकाओं का वर्णन यहां पर प्रस्तुत है :----


गार्गी जनक की सभा में उपस्थित विद्वानों में से एक थीं। उनको वेदों का अच्छा ज्ञान था। उनके और महर्षि याज्ञवल्क्य के बीच हुए संवाद (बृहदारण्यक उपनिषद – 3.6) के प्रसंग से वर्णित है कि वह एक प्रभावशाली व्यक्तित्व की स्वामिनी थीं। गार्गी के प्रश्न ‘आसमान से ऊँचा और पृथ्वी से नीचे क्या है’ ने सभा में उपस्थित सभी लोगों को सोच में डाल दिया था।


मैत्रेयी को भारतीय विदुषियों का प्रतीक माना जाता है। वह एक वैदिक दार्शनिक थीं और उनको दर्शन में निपुणता प्राप्त थी। बृहदारण्यक उपनिषद (2.4.2–4 और 2.4.5) में उनके और ऋषि याज्ञवल्क्य के बीच हुआ एक संवाद हुआ है, जिसमे वह आत्मा और ब्रह्म के अंतर पर चर्चा करती हैं। माना जाता है कि मैत्रेयी ने तत्व पर गहन अध्ययन किया था। उस समय धर्म और शिक्षा, दोनों ही क्षेत्रों में मैत्रेयी को विशेष स्थान प्राप्त था। मैत्रेयी ऋषि याज्ञवल्क्य की पत्नी थी ।


लोपामुद्रा वैदिक काल की एक दार्शनिक थीं और महर्षि अगस्त्य की पत्नी थीं। ऋग्वेद की 179वीं सूक्त उनके और उनके पति के बीच हुए एक संवाद को दर्शाता है। पंचदशी के मन्त्रों से ले कर यज्ञ संपन कराने तक लोपामुद्रा, पारिवारिक जीवन का महत्त्व समझाने से लेकर ललित सहस्त्रनाम के प्रचार-प्रसार और महाभारत में लोपामुद्रा का नाम आता है।


राजा पॉलोम की पुत्री और इंद्र की पत्नी, शचि इंद्र के दरबार में मौजूद 7 मन्त्रिकाओं में से एक थीं। बुद्धिमती और शक्ति से संपन्न होने के कारण शचि को विशेषाधिकार प्राप्त था। कुछ ग्रंथों में इंद्र को शचिपति कहकर सम्बोधित किया जाना यह दर्शाता है कि वह उस समय एक महत्वपूर्ण व्यक्तित्व थीं। ऋग्वेद (ऋचा, 10-159) में एक सूक्त में शचि ने अपनी शक्तियों का वर्णन किया है ।


मंत्रादिका, यानि मन्त्रों में निपुण, होने के साथ ही घोषा को आध्यात्म और दर्शन का भी अच्छा ज्ञान था। ऋग्वेद के दसवें मंडल के दो सूक्त (39 और 40), जिनमें कुल चौदह-चौदह मन्त्र हैं, घोषा द्वारा कहे गये हैं। घोषा को वैदिक विज्ञान, जैसे मधु विद्या का भी ज्ञान था। यह उसने अश्विनीकुमारों से सीखी थी, जो उस समय के त्वचा विशेषज्ञ थे।


अपाला अत्रि मुनि की पुत्री थीं। ऋग्वेद में लिखे हुए आठवें मंडल के साथ 7 सूक्त (8.91) उनके द्वारा इंद्र से कही गयी प्रार्थना और वार्तालाप की हैं। प्रचलित कथाओं के अनुसार, अपाला अपनी बुद्धिमत्ता के कारण पूरे भारतभर में प्रसिद्ध थीं।

Monday, 15 June 2020


Friday, 21 July 2017

त्रिविधा वाक्

त्रिविधा वाक्
=========
"ओ३म् सा विश्वायुः सा विश्वकर्मा सा विश्वधायाः । इन्द्रस्य त्वा भागं सोमेना तनच्मि विष्णो हव्यं रक्ष ।।" (यजुर्वेदः--१.४)

पदार्थः---
हे (विष्णो) व्यापक ईश्वर ! आप जिस वाणी का धारण करते हैं (सा) वह (विश्वायुः) पूर्ण आयु की देने वाली (सा) वह (विश्वकर्मा) जिससे सम्पूर्ण क्रियाकाण्ड सिद्ध होता है और (सा) वह (विशवधायाः) सब जगत् को विद्या और गुणों से धारण करने वाली है। पूर्वमन्त्र में जो प्रश्न हैं, उसके उत्तर में यही तीन प्रकार की वाणी ग्रहण करने योग्य है. इसी से मैं (इन्द्रस्य) परमेश्वर का (भागम्) सेवन करने योग्य यज्ञ को (सोमेन) विद्या से सिद्ध किए रस अथवा आनन्द से (आ तनच्मि) अपने हृदय में दृढ करता हूँ तथा हे परमेश्वर ! (हव्यम्) पूर्वोक्त यज्ञ-सम्बन्धी देने लेने योग्य द्रव्य वा विज्ञान की (रक्ष) निरन्तर रक्षा कीजिए ।

Monday, 10 July 2017

यजुर्वेद-भाष्यम्

=================
दयानन्दकृत-भाष्य
 
“ओ३म् इषे त्वोर्ज्जे त्वा वायव स्थ देवो वः सविता प्रार्पयतु श्रेष्ठतमाय कर्मणाSआप्यायध्वमघ्न्याSइन्द्राय भागं प्रजावतीरनमीवाSअयक्ष्मा मा वस्तेनSईशत माघशंसो ध्रुवाSअस्मिन् गोपतौ स्यात बह्वीर्यजमानस्य पशून् पाहि ।।”
 
पदार्थान्यवयभाषाः—
 
हे मनुष्य लोगों ! जो (सविता) सब जगह की उत्पत्ति करने वाला सम्पूर्ण ऐश्वर्य युक्त (देवः) सब सुखों को देने और सब विद्या के प्रसिद्ध करने वाला परमात्मा है । सो (वः) तुम हम और अपने मित्रों के जो (वायवः) सब क्रियाओं के सिद्ध कराने हारे स्पर्श गुण वाले प्राण अन्तःकरण और इन्द्रियाँ (स्थ) हैं उनको (श्रेष्ठतमाय) अत्युत्तम (कर्मणे) करने योग्य सर्वोपकारक यज्ञादि कर्मों के लिए (प्रार्पयतु) अच्छी प्रकार संयुक्त करे । हम लोग (इषे) अन्नादि उत्तम-उत्तम पदार्थों और विज्ञान की इच्छा और (ऊर्जे) पराक्रम अर्थात् उत्तम रस की प्राप्ति के लिए (भागम्) सेवा करने योग्य धन और ज्ञान के भरे हुए (त्वा) उक्त गुण वाले और (त्वा) श्रेष्ठ पराक्रम आदि गुणों के देनेहारे आपका सब प्रकार के आश्रय करते हैं ।
 
हे मित्र लोगों ! तुम भी ऐसे होकर (आप्यायध्वम्) उन्नति को प्राप्त हो तथा हम भी हों ।
 
हे भगवन् जगदीश्वर ! हम लोगों के (इन्द्राय) परम ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए (प्रजावतीः) जिनके बहुत सन्तान हैं तथा जो (अनमीवाः) व्याधि और (अयक्ष्माः) जिनमें राजयक्ष्मा आदि रोग नहीं हैं, वे (अघ्न्या) जो जो गौ आदि पशु वा उन्नति करने योग्य हैं जो कभी हिंसा करने योग्य नहीं हैं, कि जो इन्द्रियाँ वा पृथिवी आदि लोक हैं उनको सदैव (प्रार्पयतु) नियत कीजिए ।
 
हे जगदीश्वर ! आपकी कृपा से हम लोगों में से दुःख देने के लिए कोई (अघशंसः) पापी वा (स्तेनः) चोर डाकू (मा ईशत) मत उत्पन्न हो तथा आप इस (यजमानाय) परमेश्वर और सर्वोपकार धर्म के सेवन करने वाले मनुष्य के (पशून्) गौ, घोडे और हाथी आदि तथा लक्ष्मी और प्रजा की (पाहि) निरन्तर रक्षा कीजिए जिससे इन पदार्थों के हरने को पूर्वोक्त कोई दुष्ट मनुष्य समर्थ न हो । (अस्मिन्) इस धार्मिक (गोपतौ) पृथिवी आदि पदार्थों की रक्षा चाहने वाले सज्जन मनुष्य के समीप (बह्वीः) बहुत से उक्त पदार्थ (ध्रुवाः) निश्चल सुख के हेतु (स्यात) हों । इस मन्त्र की व्याख्या शतपथ ब्राह्मण में की है, उनका ठिकाना पूर्व संस्कृत भाष्य में लिख दिया और आगे भी ऐसा ही ठिकाना लिखा जाएगा, जिनको देखना हो, वह उन ठिकाने में देख लेवे ।
 
(श्रीर्हि पशवः)—शतपथ-ब्राह्मण–१.६.३.३६)
 
प्रजा वै पशवः—श.ब्रा. १.४.६.१७
 
अयं मन्त्रः शतपथ-ब्राह्मण–१.५.४.१–८) व्याख्यातः ।
 
भावार्थभाषाः—-
 
विद्वान् मनुष्यों को सदैव परमेश्वर और धर्मयुक्त पुरुषार्थ के आश्रय से ऋग्वेद को पढके गुण और गुणी को ठीक-ठीक जानकर सब पदार्थों के सम्प्रयोग से पुरुषार्थ की सिद्धि के लिए अत्युत्तम क्रियाओं से युक्त होना चाहिए कि अच्छे-अच्छे कामों से प्रजा की रक्षा तथा उत्तम-उत्तम गुणों से पुत्रादि की शिक्षा सदैव करें कि जिससे प्रबल रोग विघ्न और चोरों का अभाव होकर प्रजा और पुत्रादि सब सुखों को प्राप्त हों । यही श्रेष्ठ काम सब सुखों की खान है । हे मनुष्य लोगों ! आओ अपने मिलके जिसने इस संसार में आश्चर्य रूप पदार्थ रचे हैं, उस जगदीश्वर के लिए सदैव धन्यवाद देवें । वही परम दयालु ईश्वर अपनी कृपा से उक्त कामों को करते हुए मनुष्यों की सदैव रक्षा करता है ।
===============================
Website :—
www.vaidiksanskritk.com
www.shishusanskritam.com
===============================
वैदिक साहित्य की जानकारी प्राप्त करें—
www.facebook.com/vaidiksanskrit
www.facebook.com/shabdanu
लौकिक साहित्य पढें—
www.facebook.com/laukiksanskrit
आचार्य चाणक्य की नीति
www.facebook.com/chaanakyaneeti
www.vaidiksanskritk.com
www.shishusanskritam.com
संस्कृत नौकरियों के लिए—
www.facebook.com/sanskritnaukari
आयुर्वेद और हमारा जीवनः–
www.facebook.com/aayurvedjeevan
चाणक्य-नीति पढें—
www.facebook.com/chaanakyaneeti
आर्ष-साहित्य और आर्य विचारधारा के लिए
www.facebook.com/aarshdrishti
सामान्य ज्ञान प्राप्त करें—
www.facebook.com/jnanodaya
संस्कृत सीखें—
www.facebook.com/shishusanskritam
संस्कृत निबन्ध पढें—-
www.facebook.com/girvanvani
संस्कृत काव्य का रसास्वादन करें—
www.facebook.com/kavyanzali
संस्कृत सूक्ति पढें—
www.facebook.com/suktisudha
संस्कृत की कहानियाँ पढें—
www.facebook.com/kathamanzari
आर्यावर्त्त का गौरव—
www.facebook.com/aryavartgaurav
संस्कृत में मनोरंजन–
www.facebook.com/patakshepa

Sunday, 2 July 2017

योग के आठ अङ्ग

योग शब्द युजिर् योगे धातु से बना है,जिसका अर्थ है जुडना। किससे- परमात्मा से जुडना। एक युज समाधौ धातु भी है अर्थात् परमात्मा में एकाकार हो जाना—“योगः समाधिः। स च सार्वभौमश्चित्तस्य धर्मः।” (यो.द. व्यास भाष्य १.१)
योग समाधि है और वह समाधि चित्त की सब क्षिप्तादि भूमियों (अवस्थाओं) में सिद्ध हुआ चित्त (मन) का धर्म (गुण) है।
मानव जीवन का लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति है, अर्थात् दुःखों से छूटकर परमानन्द प्राप्त करना।
इन्हीं बातों को लेकर सहृदयी पतञ्जलि महामुनि दुःखी लोगों के लिये दुःख से छूटने उपाय बताये हैं। उसका आधार योग है।
योग के आठ अङ्ग होते हैं——(१.) यम, (२.) नियम,  (३.) आसन, (४.) प्राणायाम, (५.) प्रत्याहार, (६.) धारणा, (७.) ध्यान,  (८.) समाधि।
“यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयो अष्टावङानि।।” ( योगदर्शन—२.२९) ।।
प्रथम योगांग यम है।
यमों की अपरिहार्यता==============
यम-नियमादि के पालन करने में यह ध्यान अवश्य रखना चाहिए कि यमों के बिना नियमों का पालन करना बाह्यप्रदर्शन होने के कारण पतन की संभावना बनी रहती है। अतः यमों का नित्य पालन करना चाहिए। मनु महाराज (४.२०४) का वचनः—-
यमान् सेवेत सततं न नियमान् केवलान् बुधः।
यमान् पतत्यकुर्वाणो नियमान् केवलान् भजन्।।
(मनु महाराज (४.२०४)
यमों के बिना केवल इन नियमों का सेवन न करे, किन्तु इन दोनों का सेवन किया करें। जो यमों का सेवन छोडकर केवल नियमों का सेवन करता है, वह उन्नति को प्राप्त नहीं होता, किन्तु अधोगति (संसार) में गिरा रहता है।
(१.) यमः
==========
योग-मार्ग के पथिक के लिए यम प्रथम सोपान है। यम को महाव्रत कहा गया है—(जाति——-महाव्रतम्)। ये यम जाति, देश, काल की सीमाओं से न बँधने वाले सार्वभौम मानव की उन्नति के मूल व्रत है।

यम शब्द यद्यपि शास्त्रीय पारिभाषिक है, पुनरपि अपने मूल धात्वर्थ को साथ लिए हुए है। “यमु उपरमे” धातु से यम शब्द बनता है,जिसका अर्थ है कि अपनी चित्तवृत्तियों को बाह्यविषयों से रोककर नियन्त्रित करना और समाधि सिद्धि के लिए अग्रसर होना। इन यमों के मूल में अहिंसा वैसे ही सबका मूल है, जैसे अविद्या सब क्लेशों का मूल है। अहिंसा का विरोधी शब्द हिंसा है। हिंसा में मनुष्य स्वार्थवश प्रवृत्त होता है उसकी पूर्ति के लिए असत्यभाषण,चोरी, परिग्रहादि कारयों में प्रवृत्त होता है। हिंसा का कारण वैर-भावना है, वह भी स्वार्थवश होती है। अतः स्वार्थी व्यक्ति योगी कभी नहीं बन सकता। स्वार्थ का त्याग करना अत्यावश्यक है।
यम पाँच प्रकार का होता हैः—–
(क) अहिंसा, (ख) सत्य, (ग) अस्तेय, (घ) ब्रह्मचर्य, (ङ) अपरिग्रहः
“अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः।।” (योगदर्शन– २.३०) ।।
(क) अहिंसाः—-
=============
अहिंसा पर आचार्य वेद व्यास लिखते हैं— उन पाँच यमों में अहिंसा का लक्षण है—सर्वथा सब प्रकार से शरीर, वाणी और मन से सर्वदा सब कालों में पीडा देने की भावना का त्याग करना अथवा वैर-भाव न रखना। शेष चारों यम अहिंसा पर ही आश्रित है अर्थात् बिना अहिंसा के यम की सिद्धि नहीं हो सकती। अहिंसा की सिद्धि करना ही मुख्य उद्देश्य है। अहिंसा को निर्दोष करना अर्थात् शुद्ध-स्वरूप को बताने के लिये यम-नियमादि को ग्रहण किया जाता हैः—-
“तत्राहिंसा सर्वथा सर्वदा सर्वभूतानामनभिद्रोहः। 
उत्तरे च यमनियमास्तन्मूलास्तत्सिद्धिपरतयैव तत्प्रतिपादनाय प्रतिपाद्यन्ते। 
तदवदातरूपकरणायैवोपादीयन्ते——।।” (व्यास भाष्य, योगदर्शन–२.३०)
सब प्रकार से सब कालों में प्राणिमात्र को दुःख न देना अहिंसा है। किसी प्राणि के प्रति द्रोह करना , ईर्ष्या करना, क्रोध करना आदि समस्त व्यवहार हिंसामूलक होता है। हिंसारत पुरुष को कहीं शान्ति नहीं मिल सकती।
मनु महाराज ने कहा हैः—–नहि वैरेण वैराणि प्रशाम्यन्ति कदाचन।
वैर भावना रखने से शत्रुता कभी खत्म नहीं हो सकती और वैरभावना मानसिक अशान्ति का मूल है। इसलिए योगाभ्यासी को हिंसावृत्ति को छोड देना चाहिए। उसका व्यवहार इस प्रकार का होना चाहिएः—-
मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणां भावनातश्चित्तप्रसादनम्। (योगदर्शन–१.३३)
अर्थात् साधक को चाहिए कि वह सुखी और साधन-सम्पन्न लोगों के साथ मित्रता की भावना रखे, दुःखी लोगों के साथ दया की भावना रखे पुण्यात्माओं और महापुरुषों के प्रति हर्ष की भावना रखे, अपुण्यात्माओं (पापी) लोगों के प्रति उदासीनता की भावना रखे ।
(ख) सत्यः
==============
सत्य वह है जो पदार्थ जैसा है उसे वैसा कहना मानना व जानना सत्य है। इन्द्रियों से जैसा प्रत्यक्ष किया है, अनुमान से जैसा जाना है और जैसा दूसरों से सुना है ठीक वैसे ही वाणी और मन का होना सत्य है और दूसरे मनुष्यों में अपने ज्ञान को पहुँचाने के लिए जो वाणी बोली गई है, यदि वह ठगने वाली, भ्रान्ति पैदा करने वाली और जिससे सही या गलत कुछ भी बोध न होता हो, ऐसी वाणी न हो, तो वह सत्य है। यह सत्य वाणी सभी प्राणियों के उपकार के लिए हो, प्राणियों को दुःख देने के लिए न हो।यदि दूसरों को दुःख होता है तो वह सत्य नहीं है।इससे अपुण्य ही होता है।इसलिए वाणी की परीक्षा करके (सोच-समझकर) प्राणिमात्र के लिए हितकर सत्यवचन बोलने चाहिएः—
सत्यं यथार्थे वाङ्मनसे। यथा दृष्टं यथा अनुमितं यथा श्रुतं तथा वाङ्मनश्चेति। परत्र स्वबोधसंक्रान्तये वागुक्ता, सा यदि न वञ्चिता भ्रान्ता वा प्रतिपत्तिवन्ध्या वा भवेदिति। एषा सर्वभूतोपकारार्थं प्रवता न भूतोपघाताय। यदि चैवमप्यभिधीयमाना भूतोपघातपरैव स्यान्न सत्यं भवेत्पापमेव भवेत्तेन पुण्याभासेन पुण्यप्रतिरूपकेण कष्टतमं प्राप्नुयात्। तस्मात्परीक्ष्य सर्वभूतहितं सत्यं ब्रूयात्।
जैसा देखा, सुना तथा जाना वैसा ही मन और वाणी से व्यवहार करना सत्य कहलाता है। छल-कपट वाली वाणी का व्यवहार कदापि नहीं करना चाहिए। ऐसी वाणी कभी न बोलें जिससे दूसरों को दुःख हो।दूसरों की हानि अपनी वाणी से कदापि न करें। पूर्णतया परीक्षा करके वाणी का प्रयोग करें।
(ग) अस्तेयः
==============
शास्त्रोक्त विधान के विरुद्ध दूसरों के द्रव्य का ग्रहण करना स्तेय (चोरी) है, उसका प्रतिषेध (अभाव) होना तथा अस्पृहारूप-दूसरे के द्रव्य के ग्रहण करने की इच्छा भी न करना यह तीसरा यम है।
व्यास भाष्यः—-स्तेयमशास्त्रपूर्वकं द्रव्याणां परतः स्वीकरणं, तत्प्रतिषेधः पुनरस्पृहारूपमस्तेयमिति।
चोरी न करना अस्तेय है। दूसरों की वस्तु बिना पूछे लेना और उसका प्रयोग करना चोरी है। शास्त्र-विरुद्ध ढंग से किसी की वस्तु हस्तगत करना चोरी है। मानसिक चोरी भी होती है।जैसे दूसरे की वस्तु के ग्रहण करने की लालसा भी चोरी है। अतः साधक को इस दुष्प्रवृत्ति का सर्वथा त्याग करना चाहिए।
(घ) ब्रह्मचर्यः
==============
गुप्त-इन्द्रिय का संयम करना ब्रह्मचर्य नामक चौथा यम है।
व्या.भा.—–ब्रह्मचर्यं गुप्तेन्द्रियस्योपस्थस्य संयमः।
कामवासनाओं को उत्तेजित करने वाले खान-पान, दृश्य, श्रव्य, शृङ्गारादि से सर्वथा बचते हुए वीर्य रक्षा करना ब्रह्मचर्य है।
(ङ) अपरिग्रहः
==============
विषय (संसार) के बन्धन के कारण धनादि भोग्य-पदार्थों के अर्जन(संग्रह) करने में दोष, रक्षण(संग्रह) किये हुओं की रक्षा करने में दोष, क्षय-उनके नाश होने में दोष, संग-उनमें आसक्त होने में दोष, और हिंसा(प्राणियों की हिंसा) पीडा में दोष दिखाई देने से इन भोग्य पदार्थों को संग्रह न करना ही अपरिग्रह है।ये कुल पाँच यम हैं।
व्या.भा.—–विषयाणामर्जनरक्षणक्षयसंगहिंसादोषदर्शनादस्वीकरणमपरिग्रह इत्येते यमाः।।
धन को जमा करने में क्या दुःख होता है, एक कवि का विश्लेषणः—-
अर्थानामर्जने दुःखमर्जितानाञ्च रक्षणे।
आये दुःखं व्यये दुःखं धिगर्थान् कष्टसंश्रयान्।।
अर्थः—-धन को जमा करने तरह-2 के दुःख और उसकी रक्षा करने में भी दुःख। थोडा सा पलक झपकाओ, लोग उडा ले जाते हैं। खुली आँख में धूल झोंककर ठगकर ले जाते हैं धन आने पर दुःख व्यय होने पर भी दुःख। धिक्कार ऐसे धन को।
इस संसार में जीने के लिए सांसारिक पदार्थों की परमावश्यकता होती है, परन्तु इन साधनों को साध्य कभी नहीं बनाना चाहिए और ना ही इनमें आसक्ति होनी चाहिए। इनसे लोभादि वृत्तियाँ जागृत हो जाती हैं। इनके वशीभूत होकर मनुष्य अनावश्यक पदार्थों के संग्रह में लग जाता है। विशेष वस्त्रों व मकानों से बचना चाहिए। (मनसि च परितुष्टे को अर्थवान् को दरिद्रः) शृंगार से बचना चाहिए। योगाभ्यासी पुरुष को परिग्रह वृत्ति का सर्वथा त्याग कर देना चाहिए।
अहिंसादि पाँच यमों का बहाना
==================
“जातिदेशकालसमयानविच्छिन्नाः सार्वभौमा महाव्रतम् ।।” (योगदर्शन–२.३१)
अर्थः—-वे अहिंसा, अस्तेय, सत्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह ये पाँच यम जाति (पशु-पक्षी, मनुष्यादि), देश (स्थानविशेष), काल (तिथि आदि), समय (शिष्ट-परम्परा अथवा कर्त्तव्य की सीमाओं से न बँधे हुए अर्थात् सर्वत्र, सर्वदा और सर्वथा करने योग्य) सर्वत्र प्रसिद्ध, सब मनुष्यों के लिए हितकर महान् व्रत है।
यहाँ पर अहिंसादि पाँच यमों को सार्वभौम महाव्रत कहा है। अतः योगाभ्यासी को इन यमों का पालन जीवन पर्यन्त करना चाहिए।
जिह्वा के लालची हिंसा करने वाले तरह-2 के बहाने बनाते हैं। कुछ लोग ये कहते हैं कि मैं अण्डे खाता हूँ, अण्डा मांसाहार में नहीं आता, अपितु शाकाहार ही है। कुछ ये कहते हैं कि मैं सिर्फ मछलियाँ खाता हूँ, दूसरे जीवों की हत्या नहीं करता। कुछ लोग ये कहते हैं कि मैं किसी पवित्र-स्थल पर हत्या नहीं करता। कुछ लोग ये कहते हैं कि मैं पूर्णिमा या अमावस्या या त्योहारों में हत्या नहीं करता, कुछ लोग ये कहते हैं कि मैं सिर्फ देव लोगों (माता,पिता,आचार्य, ब्राह्मण आदि) की रक्षा के ही हत्या करूँगा अन्य कार्य के लिए नहीं।
ये सब जाति, देश, काल, समय की सीमाओं से बँधे हुए हैं। वस्तुतः हिंसा तो हिंसा ही होती है। योग-साधकों के लिए सर्वथा प्रतिबन्धित है।
यम योगी की नींव है। इसी पर योग की इमारत टिकी है। इसका पालन अवश्य करना चाहिए, यदि साधना में आगे बढना है तो।
(२.) नियमः
========
योग का दूसरा अङ्ग नियम है। नियम भी पाँच होते हैं—-(क) शौच, (ख)  संतोष, (ग) तप, (घ)  स्वाध्याय, (ङ)  ईश्वरप्रणिधान।
तद्यथा—“शौचसंतोषतपः स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः “ (योगदर्शन–२.३२)
(क) शौचः
=============
पहला नियम शौच ही है। इसका अभिप्राय पवित्रता है। हमारे जीवन में पवित्रता दो तरह से आती हैः–बाह्य और आन्तरिक। बाहरी पवित्रता स्नानादि से आती है।और पवित्र खाद्य पदार्थों के सेवन और अपवित्र खाद्य पदार्थों के त्याग से यह पवित्रता आती है। आन्तरिक पवित्रता दो तरह से हो सकती है। शौच (मलत्याग) व मूत्रत्याग से शारीरिक पवित्रता। दूसरी पवित्रता मानसिक है-मन की बुराइयों को हटाना, अविद्या, मिथ्याज्ञान से उत्पन्न राग, द्वेषादि मलों को यथार्थ ज्ञान से धोना।
मनुस्मृति (५.१०९) का प्रमाणः—-
“अद्भिर्गात्राणि शुध्यन्ति मनः सत्येन शुध्यति।
विद्यातपोभ्यां भूतात्मा बुद्धिर्ज्ञानेन शुध्यति।।”
(मनुस्मृति ५.१०९)
अर्थात् स्नान से शरीर, सत्य से मन, विद्या तथा तप से आत्मा और ज्ञान से बुद्धि शुद्ध होती है।
व्यास-भाष्यः—–“तत्र शौचं मृज्जलादिजनितं मेध्याभ्यवहरणादि च बाह्यम्। आभ्यन्तरञ्चित्तमलानामाक्षालनम्।”
(ख) संतोषः
=========
दूसरा नियम संतोष (लोभरहित) वृत्ति है। जीवन-निर्वाह के लिए मौजुद साधनों से अधिक साधनों के ग्रहण करने की इच्छा न करना संतोष है :—“संतोषः संनिहितसाधनादधिकस्यानुपादित्सा।”
(ग) तपः
=======
तीसरा नियम तप है।तप कहते हैं द्वन्द्वों को सहन करना, अर्थात् भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी, उठने-बैठने का अभ्यास, काष्ठमौन-आकारमौन (इशारे से भी अपने भाव को प्रकट न करना और वाणी से भी न बोलना, किन्तु इशारों से भाव को प्रकट करते रहना आकारमौन है)। काष्ठमौन-आकारमौन ये दोनों द्वन्द्व है, इनका सहन करना तप है। इनके अतिरिक्त व्रत भी तप के अन्तर्गत आते हैं। जैसेः—-कृच्छ्रव्रत, चान्द्रायण व्रत और सान्तपनादि।
“गोमूत्रं गोमयं क्षीरं दधि सर्पिः कुशोदकम्।
एक रात्रोपवासश्च कृच्छ्रं सान्तपनं स्मृतम्।।”
(मनु स्मृति ११.२१२)
अर्थात् गोमूत्र, गोबर, दूध, दही, घी और कुशाओं का जल इन सबको मिलाकर एक-एक दिन छोडकर खावे तो वह सांतपन कृच्छ्रव्रत होता है।
इन व्रतों का यथायोग्य (शरीर की अनुकूलता के अनुसार पालन करना चाहिए।
व्यास-भाष्यः—“तपो द्वन्द्वसहनम्। द्वन्द्व च जिघत्सापिपासे शीतोष्णे स्थानासने काष्ठमौनाकारमौने च। व्रतानि चैषां यथायोगं कृच्छ्रचान्द्रायणसांतपनादीनि।”
मोक्ष का उपदेश करने वाली योगदर्शनादि शास्त्रों का अध्ययन करना और प्रणव (ओम्) का जप करना स्वाध्याय कहलाता है(स्वाध्यायो मोक्षशास्त्राणामध्ययनं प्रणवजपो वा।)
ईश्वर को सब अर्पण कर देना ईश्वर-प्रणिधान है। परमगुरु परमात्मा में अपने को और अपने कार्यों को अर्पण कर देना। इस प्रकार के अनुष्ठान व ऐसी भावना से भगवान् के प्रति भक्ति का उद्रेक जागृत होता है, तथा बाह्य व्यवहार से चित्त हटा रहता है।
“ईश्वरप्रणिधानं तस्मिन्परमगुरौ सर्वकर्मार्पणम्।
जीवन्मुक्त योगी पुरुष चाहे शय्या अथवा आसन पर स्थित हो, चाहे मार्ग में जा रहा हो, वह ईश्वरप्रणिधान के द्वारा स्वरूप में ही स्थित होता है, उसके समस्त संशय, अज्ञान हिंसादि नष्ट हो गए हैं और वह योगी संसार के बीज (अविद्यादि क्लेशों) तथा अविद्याजन्य (संस्कारों) का नाश करता हुआ नित्य योगाभ्यास करता हुआ अमृतभोग (मोक्ष के आनन्द) का अधिकारी बन जाता है।

योग-विरोधी भावनाएँ
================जब योगी के मन में योग-विरोधी भावनाएँ प्रबल होने लगें (जैसे मैं अहित करने वाले को मार दूँगा, इस अपकारी के विषय में झूठ भी बोलूँगा, इसका धन भी ले लूँगा, इसकी पत्नी के साथ दुराचार करूँगा, इसके धन को ले लूँगा, अपना अधिकार कर लूँगा। इस प्रकार के विपरीत मार्ग की ओर ले जाने वाले अतीव प्रबल हिंसादि वृत्तियों के रोग से पीडित होता हुआ योगी विरोधी भावों को प्रबुद्ध करें) तो योगी को क्या करना चाहिए। उसके लिए ऋषि व्यास उपाय बताते हैं। उसे ये सोचना चाहिए– भयंकर संसार रूपी अंगारों में भूने जाते हुए मेरे द्वारा अर्थात् संसार के दुःखों से सन्तप्त होकर मैंने सब जीवों को अभयदान देने की भावना से योगधर्म की शरण ली थी और वहीं मैं अब योगधर्म को छोडकर फिर उन्हीं हिंसादि वितर्कों (विरोधी) भावों को ग्रहण करता जा रहा हूँ। ये तो ऐसे ही है, जैसे कुत्ते की वृत्ति हो। कुत्ता अपने उगले हुए वमन को स्वयं फिर चाट लेता है, वैसे ही छोडे हुए वितर्कादि को फिर मैं ग्रहण करने वाला हो गया हूँ। इस प्रकार वितर्कादि भावों को रोकने के लिए वितर्कविरोधी भावों को प्रबुद्ध करं।व्यास-भाष्यः—-“यदा अस्य ब्राह्मणस्य हिंसादयो वितर्का जायेरन्——यथा श्वा वान्तवलेही तथा त्यक्तस्य पुनराददान इति।”
 (३.) आसनः
=========
“स्थिरसुखमासनम्” (योगदर्शन–२.४६ )
जिसमें सुखपूर्वक शरीर और आत्मा स्थिर हों, उसको आसन कहते हैं, अथवा जैसी रुचि हो वैसा आसन करें। वे आसन ये हैं—-पद्मासन, भद्रासन, स्वस्तिकासन, दण्डासन, सोपाश्रय (सहारे के साथ आसन), पर्यङ्कासन, क्रौञ्चनिषदन(क्रौञ्च पक्षी की तरह बैठना), हस्तिनिषदन (हाथी की तरह बैठना), उष्ट्रनिषदन (ऊँट की तरह बैठना), और समसंस्थान। ये सब आसन स्थिर तथा सुख देने वाले हैं।इन आसनों में से जिस आसन में योगी को सुख मिले, उसी का अभ्यास करना चाहिए।
चित्तवृत्तियों का निरोध कर तप, उपासनादि करने के लिए स्थिर होना कठिन होता है। अतः जप, उपासना करने के लिए योगाभ्यासी को किसी एसे आसन का अभ्यास चाहिए, जिसमें कई घण्टों तक सुखपूर्वक बैठ सकें।
आसन के विषय में यहाँ सूत्रकार पतञ्जलि ने दो विशेष बातें कही हैं–स्थिरता और सुख। स्थिरता से अभिप्राय है– उपासना के समय शरीर के किसी अङ्ग का भी चञ्चल न होना। मक्खी, मच्छर आदि के बैठने से अथवा शारीरिक खाज-खुजली से भी स्थिरता भंग न होनी चाहिए। अन्यथा शरीर के चंचल होते ही चित्त चंचल हो जाएगा। सुख से अभिप्राय है कि जिस आसन में अभ्यासी बैठा है, उसमें किसी प्रकार का कष्ट न होना। क्योंकि जिस आसन का पूर्णतः अभ्यास नहीं होता, उससे घुटने आदि भागों में पीडा होने लगती है।नीचे से भूमि का भाग चुभने लगता है, इत्यादि। अतः इसके समान भूनि का होना, नितम्बों के नीचे गद्दीदार आसन बिछाना, एकान्त व पवित्र स्थान का होना, वायु का शुद्ध होना, मच्छरादि का न होना और शारीरिक खाजादि रोगों का न होना अत्यन्त आवश्यक है इसी प्रकार युक्त आहार, विहार, शुद्ध आहार युक्त सोना-जागना आवश्यक है।
योग में आसन की स्थिरता और सुख के उपाय
==========================“प्रयत्नशैथिल्यानन्तसमापत्तिभ्याम्।।”  (योगदर्शन २.४७)व्यास-भाष्यः
“भवतीति वाक्यशेषः। प्रयत्नोपरमात्सिध्यत्यासनं येन नाङ्गमेजयो भवति। अनन्ते वा समापन्नं चित्तमासनं निर्वर्तयतीति।।”
सूत्रार्थः—- शारीरिक चेष्टाओं को रोक देने से आसन सिद्ध होता है और उससे शरीर में कम्पन नहीं होता। (यहाँ पर भवति क्रिया को वाक्य से जोडना चाहिए।(यहाँ पर वा समुच्चयार्थक है) इससे अनन्त सर्व्यापक परमात्मा में मन की स्थिति करने से आसन सिद्ध हो जाता है।
जब साधक ध्यान के लिए किसी आसन में बैठता है तो बहुत काल तक बैठने से शरीर में अकडाहट अथवा कम्पनादि होने लगती है, जिससे योग में बाधा आती है और सर्वव्यापक परमात्मा में मन लगाना कठिन हो जाता है। मन लगाने के लिए आसन का सिद्ध होना जरूरी है। यह मन सान्त, एकदेशी, सांसारिक वस्तु में सदा स्थिर नहीं रह सकता। अनन्त के साथ तादात्म्य होने से ही आसन सिद्धि और देह में स्थिरता आ सकती है।

इन प्रयत्न-शैथिल्य और अनन्त समापत्ति के बिना योगाभ्यासी को जप-उपासना में भी बाधाएँ आ जाती हैं।शारीरिक स्वाभाविक चेष्टाओँ का नाम प्रयत्न है। उसमें शिथिलता न करने पर शरीर में खिंचाव बने रहने से अकडाहट अथवा कम्पनादि होने से योग-साधना में बाधा होती है और योगी बहुत देर तक योगाभ्यास नहीं कर सकता। अतः शरीर में मृदुता रखने के लिए प्रयत्न-शैथिल्य करना आवश्यक है और अनन्त समापत्ति से अभिप्राय सर्वव्यापक परमेश्वर से तादात्म्य करना अर्थात् ईश्वरीय गुणों का चिन्तन, तदनुरूप भावना करने में मन को लगाना। अनन्त परमेश्वर के गुणों की सीमा न पाने से मन उसी में रमा रहता है। यदि ऐसा न किया जाए अथवा किसी सान्त पदार्थ का चिन्तन किया जाए तो सान्त की सीमा पाने पर मन स्थिर सदा न रह सकेगा। मन के चञ्चल होने अन्यमनस्कता आ जाएगी और योग सिद्ध न हो सकेगा , क्योंकि मन का यह स्वभाव है कि वह किसी पदार्थ में तभी तक लग पाता है, जब तक उसकी सीमा को न जान जावे।
(४.) प्राणायामः
===========
प्राणायाम का स्वरूपः
===========
“तस्मिन्सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः ।।” (योगदर्शन–२.४९)
व्यास-भाष्यः—–
“सत्यासने-जये बाह्यस्य वायोराचमनं श्वासः, कौष्ठ्यस्यवायोर्निःसारणं प्रश्वासः तयोर्गतिविच्छेद उभयाभावः प्राणायामः।।”
सूत्रार्थः—
आसन के सिद्ध हो जाने पर श्वास और प्रश्वास में — सांस के लेने छोडने में गति का रुक जाना यो रोक देना प्राणायाम कहलाता है।
ऋग्वेदादि भाष्यदभूमिका—-
जो वायु बाहर से भीतर को आता है, उसको श्वास और जो भीतर से बाहर जाता है, उसको प्रश्वास कहते हैं। उन दोनों के जाने-आने को विचार से रोकें, नासिका को हाथ से कभी न पकडे, किन्तु ज्ञान से ही उनके रोकने को प्राणायामकहते हैं।
भावार्थः–
प्राणायाम के सफल होने के लिए योग के पूर्व के तीनों अंगों (यम,नियम और आसन) का अनुष्ठान होना आवश्यक है। फिर भी प्राणायाम के लिए आसन का सिद्ध होना अत्यावश्यक है। इसके बिना प्राणायाम सम्भव नहीं है। यद्यपि श्वास-प्रश्वास की गति जीवन भर चलती रहती है, सोते समय भी इनकी गति अवरुद्ध नहीं होती, परन्तु ऐसा स्वाभाविक प्राण को आना-जाना प्राणायाम नहीं है। प्राणायाम तभी होता है, जब श्वास-प्रश्वास की स्वाभाविक गति को कुछ अवधि के लिए रोक दिया जाए।
प्राणायाम के भेदः
=================
“स तु बाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिर्देशकालसंख्याभिः परिदृष्टो दीर्घसूक्ष्मः”  (योगदर्शन–२.५०)
यहाँ पर प्राणायाम के तीन भेद बजाए जा रहे हैं—–(१.) बाह्य प्राणायाम, (२.) आभ्यन्तर प्राणायाम,  (३.)  स्तम्भवृत्ति-प्राणायाम
(१.) बाह्य-प्राणायामः—-इसमें पेट की वायु को बाहर निकाल कर बाहर ही रोक देते हैं।
(२.) आभ्यन्तर-प्राणायामः—–इसमें बाहर की वायु को अन्दर लोकर अन्दर ही रोक देते हैं।
(३.) स्तम्भवृत्ति-प्राणायामः—-इसमें श्वास और प्रश्वास दोनों गतियों को रोकना होता है। यह एक साथ ही किया जाता है।
ऋग्वेदादि-भाष्य-भूमिकाः—यह प्राणायाम चार प्रकार से होता है। अर्थात् एक बाह्य विषय, दूसरा आभ्यन्तर विषय, तीसरा स्तम्भवृत्ति और चौथा बाहर-भीतर रोकने से होता है।
वे चार प्राणायाम इस प्रकार से होते हैं कि जब भीतर से बाहर को श्वास निकले तब उसको बाहर ही रोक दे, इसे प्रथम प्राणायाम कहते हैं। जब बाहर से श्वास भीतर को आवें,तब उसको जितना रोक सके, उतना भीतर ही रोक दे, इसको दूसरा प्राणायाम कहते हैं। तीसरा स्तम्भवृत्ति है कि न प्राण को बाहर निकले और न बाहर से भीतर ले जाए, किन्तु जितनी देर सुख से रोक सके , उसको जहाँ का तहाँ ज्यों का त्यों एकदम रोक दे। और चौथा यह है कि जब श्वास भीतर से बाहर को आवे तब बाहर ही कुछ-कुछ रोकता रहे और जब बाहर से भीतर जावे, तब उसको भी थोडा-थोडा रोकता रहे, इसको बाह्याभ्यन्तराक्षेपी कहते हैं और इन चारों का अनुष्ठान इसलिए है कि जिससे चित्त निर्मल होकर उपासना में स्थिर रहे।
इन तीनों के अन्य नाम भी हैः————रेचक (बाह्य)पूरक (आभ्यन्तर), और कुम्भक (स्तम्भवृत्ति)
(१.) रेचकः—-रेचक नाम इसलिए है कि इसमें प्राण का रेचन अर्थात् शरीर से बाहर होने से पृथक् भाव होता है।
(२.) पूरकः—-इसमें बाहर की वायु को अन्दर भरना होता है और यथाशक्ति अन्दर ही रोकना होता है।
(३.) कुम्भकः—इसमें प्राणवायु को बाहर-भीतर न करके जहाँ का तहाँ रोकना होता है, इसलिए इसे कुम्भक कहते हैं। जैसे कुम्भ (घडे) में भरा जल इधर-उधर नहीं जाता , एक स्थान पर ही निश्चल रहता है, वैसे ही इस प्राणायाम नें प्राण की स्थिति होती है।
प्राणायाम की विधिः
==================
प्राणायाम का अभ्यास किस प्राणायाम से करना चाहिए।
इस बात का संकेत पतञ्जलि ने बाह्य शब्द पहले पढकर दिया है, अर्थात् योगाभ्यासी को सबसे पहले बाह्य (रेचक) प्राणायाम करना चाहिए। इसके बाद दूसरे प्राणायाम करने चाहिए। बाह्य प्राणायाम को करने की विधि यह है कि वमन(उल्टी) की तरह तेजी से प्राण-वायु को बाहर फेंककर बाहर ही यथशक्ति रोक देना चाहिए और इसी दशा में प्रणव (ओ३म्) का जाप मानसिक रूप में करना चाहिए या फिर महाव्याहृति का जाप करना चाहिए। जो इस प्रकार हैं—-ओ३म् भूः। ओ३म् भुवः। ओ३म् स्वः। ओ३म् महः। ओ३म् जनः। ओ३म् तपः। ओ३म् सत्यम्।
इसका बार-बार जाप करना चाहिए। गायत्री मन्त्र से बढकर कोई मन्त्र नहीं, इसका भी जाप किया जा सकता है.जो इस प्रकार है—
ओ३म् भूर्भुवः स्वः। तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्।।
बाह्य प्राणायाम के अभ्यास के बाद दूसरे प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए और वो भी धीरे-धीरे । महर्षि दयानन्द जी ने नए साधक के लिए तीन प्राणायाम से लेकर २१ प्राणायाम तक करने की बात कही है। सूत्रकार पतञ्जलि ने भी देश, काल और संख्या की दृष्टि से कहा है कि नए साधक को धीरे-धीरे प्राणायाम बढाना चाहिए।

चौथा प्राणायाम
===========
“बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी चतुर्थः।।” (योगदर्शन–२.५१)

सूत्रार्थः———-
बाह्य और आभ्यन्तर प्राणायामों के विषय को दूर फेंकने वाला चतुर्थ प्राणायाम होता है।
ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका के अनुसारः-
जब श्वास भीतर से बाहर को आवे, तब बाहर ही कुछ-2 रोकता रहे और जब बाहर से भीतर जावे तब उसको भीतर ही थोडा-2 रोकता रहे। इसको बाह्याभ्यन्तराक्षेपी कहते हैं।
सत्यार्थप्रकाशः—
जब प्राण भीतर से बाहर निकलने लगे तब उससे विरुद्ध उसको न निकलने देने के लिए बाहर से भीतर लें और जब बाहर से भीतर आने लगे तब भीतर से बाहर की ओर प्राण को धक्का देकर रोकता जाए।
व्यास-भाष्यः———
“देशकालं संख्याभिर्बाह्यविषयपरिदृष्ट आक्षिप्तः। तथा आभ्यन्तरविषयपरिदृष्ट आक्षिप्तः। उभयथा दीर्घसूक्ष्मः। तत्पूर्वको भूमिजयात्क्रमेणोभयोर्गत्यभावश्चतुर्थः प्राणायामः।”
आङ् पूर्वक क्षिप् धातु का प्रयोग निवृत्ति अर्थ में होता है, परन्तु यहाँ पर व्यास-भाष्य में इसका अतिक्रान्त अर्थ अधिक संगत है। इस कारण इस प्राणायाम के उच्चस्तर की पुष्टि होती है।इस प्राणायाम में क्रिया-व्यापार पहले से ही निश्चित और परीक्षित होता है और उच्चस्तर में पहुँचकर दोनों प्राणायामों की निवृत्ति अथवा अतिक्रमण किया जाता है, अर्थात् भीतर प्राण रोक रक्खा हो और वह बाहर निकलना चाहता है उसके विपरीत बाहर से भीतर धक्का देना तथा बाहर निकलने न देना चतुर्थ प्राणायाम है। इसी प्रकार प्राण को बाहर रोक रक्खा है, भीतर जाना चाहता है, इसके विपरीत भीतर से बाहर धक्का देना तथा भीतर न जाने देना चतुर्थ प्राणायाम है। इस प्राणायाम को एकदम से प्रारम्भ नहीं करना चाहिए। पहले बाह्य अथवा आभ्यन्तर प्राणायाम की प्रक्रिया चल रही हो, फिर उनका अतिक्रमण करके दोनों प्राणवायु को रोकना चतुर्थ प्राणायाम है।
प्राणायाम के लाभः
===============
“ततः क्षीयते प्रकाशावरणम्।।” (योगदर्शन–२.५२)
सूत्रार्थः—-उपर्युक्त प्राणायामों के निरन्तर अभ्यास से विवेकज्ञान को ढकने वाला अविद्याजन्य कर्माशय दुर्बल होते हुए क्षीण हो जाते हैं।
ऋग्वेदादि-भाष्य-भूमिकाः—
इस प्रकार प्राणायामपूर्वक उपासना करने से आत्मा के ज्ञान का ढकने वाला आवरण जो अज्ञान है, वह नित्यप्रति नष्ट होता जाता है और ज्ञान का प्रकाश धीरे-धीरे बढता जाता है।

सत्यार्थ-प्रकाशः———-
(१.) ऐसे एक-दूसरे के विरुद्ध क्रिया करें तो दोनों की गति रुककर प्राण अपने वश में होने से मन और इन्द्रियाँ भी स्वाधीन होते हैं। बल पुरुषार्थ बढकर बुद्धि तीव्र सूक्ष्मरूप हो जाती है कि जो बहुत कठिन और सूक्ष्म विषय को भी शीघ्र ग्रहण करती है। इससे मनुष्य शरीर में वीर्यवृद्धि को प्राप्त होकर स्थिर, बल, पराक्रम, जितेन्द्रियता, सब शास्त्रों को थोडे ही काल में समझकर उपस्थित कर लेगा। सत्री भी इसी प्रकार योगाभ्यास करें।
(२.) जब मनुष्य प्राणायाम करता है, तब प्रतिक्षण उत्तरोत्तर काल में अशुद्धि का नाश और ज्ञान का प्रकाश होता जाता है। जब तक मुक्ति न हो तब तक उसके आत्मा का ज्ञान बराबर बढता जाता है।
सूत्र का भावार्थः—-
इस सूत्र में प्राणायाम करने का फल-कथन किया गया है। प्राणायाम के निरन्तर अभ्यास करने से विवेक-ज्ञान को ढकने वाला आवरण (चित्तस्थ अशुभ संस्कार रूप पर्दा) क्षीण हो जाता है। इसी अशुद्धि के कारण जीवात्मा सांसारिक बन्धनों में बँधा रहता है और विवेकज्ञान (जड-चेतन का भेद) नहीं होने देता। प्राणायाम से इस अशुद्धि का नाश कैसे होता है, इसका स्पष्टीकरण उदाहरण देकर मनुस्मृति में बताया गया है, जिससे प्राणायाम का फल बहुत ही स्पष्ट हो जाता है—-
(क) “दह्यन्ते ध्मायमानानां धातूनां च यथा मलाः।
तथेन्द्रियाणां दह्यन्ते दोषाः प्राणस्य निग्रहात्।।”
(मनुस्मृतिः–६.७१)
अर्थः–जैसे अग्नि में तपाने से सुवर्णादि धातुओं का मल नष्ट होकर शुद्ध होता है, वैसे प्राणायाम करके मन आदि इन्द्रियों के दोष क्षीण होकर निर्मल हो जाते हैं।
(ख) “प्राणायामा ब्राह्मणस्य त्रयो अपि विधिवत्कृताः।
व्याहृतिप्रणवैर्युक्ता विज्ञेयं परमं तपः।।”
(मनस्मृतिः–६.७०)
अर्थः—जो ब्राह्मण (वेदों का विद्वान्) ब्रह्मज्ञान का इच्छुक है, उसके लिए यथाविधि ओङ्कारोपासना तथा महाव्याहृति के जप के साथ किए गए कम-से-कम तीन प्राणायाम भी परम-तप कहलाता है। इस प्रकार योगाभ्यासी के लिए प्राणायाम करने का विशेष महत्त्व है, क्योंकि इससे योगमार्ग के चरम लक्ष्य (विवेकख्याति) की प्राप्ति में मनादि इन्द्रियों के दोष क्षीण होने से अत्यधिक सहायता मिलती है।
प्राणायाम के अन्य लाभ
=================
“धारणासु च योग्यता मनसः ।।” (योगदर्शन–२.५३)
व्यास-भाष्य—-
“प्राणायामाभ्यासादेव “प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य” (योगदर्शन–१.३४) इति वचनात् ।।”
भाष्यानुवादः—-प्राणायाम के अभ्यास करने से ही धारणा करने में अर्थात् परमेश्वर में मन की धारणा होने से मन की योग्यता बढ जाती है। इसमें “प्रच्छर्दन-विधारणाभ्यां वा प्राणस्य” सूत्र भी प्रमाण है।
सूत्रार्थः—
ऋग्वेदादि-भाष्य-भूमिकाः— “उस अभ्यास से यह भी फल होता है कि (किंच धारणा0) परमेश्वर के बीच में मन और आत्मा की धारणा होने से मोक्षपर्यन्त उपासना योग और ज्ञान की योग्यता बढती जाती है, तथा उससे व्यवहार और परमार्थ का विवेक भी बराबर बढता रहता है।”
सूत्र का भावार्थः—–प्राणायाम करने का पूर्वोक्त लाभ चित्तस्थ अशुद्धि का नाश तो होता ही है, और दूसरा लाभ यह है कि मन के एकाग्र करने में भी पर्याप्त सहायता मिलती है। धरणा का लक्षण (योगदर्शन–३.१) सूत्र में यह किया है कि चित्त को शरीर में किसी स्थान में बाँध देना ही धारणा है और प्राणायाम करने से धारणा करने में मन की योग्यता-क्षमता हो जाती है। इसलिए योग के धारणादि अन्तरंग अंगों के अनुष्ठान करने में प्राणायाम मुख्य आधार है।
(५.) प्रत्याहार
===========
प्रत्याहार का स्वरूपः—“स्वविषयासंप्रयोगे चित्तस्वरूपानुकार इवेन्द्रियाणां प्रत्याहारः।।” (योगदर्शन—२.५४)
व्यास-भाष्यः—“स्वविषयसंप्रयोगाभावे चित्तस्वरूपानुकार इवेति चित्तनिरोधे चित्तवन्निरुद्धानीन्द्रियाणि नेतरेन्द्रियजयवदुपायान्तरमपेक्षन्ते। यथा मधुकरराजं मक्षिका उत्पन्तमनूत्पतन्ति निविशमानमनुनिविशन्ते तथेन्द्रियाणि चित्तनिरोधे निरुद्धानीत्येष प्रत्याहारः।।”
भाष्यानुवादः—-इन्द्रियों के अपने-2 विषयों (रूपरसादि) का संप्रयोग-संन्निकर्ष न होने पर मानों चित्तवृत्ति के अनुरूप ही इन्द्रियाँ हो जाती हैं, इसलिए चित्त के निरोध होने पर चित्त के समान इन्द्रियाँ भी निरुद्ध हो जाती हैं। इन्द्रियों को जीतने के अन्य उपाय की आवश्यकता नहीं होती। जैसे –शहद का संग्रह करने वाली मक्खियाँ मधु बनाने वाले राजा के साथ उडते हुए उड जाती हैं और बैठते हुए उस राजा के साथ बैठ जैती है। वैसे ही इन्द्रियाँ चित्त के निरोध हो जाने पर (बाह्य विषयों से विमुख हो जाने पर) निरुद्ध हो जाती हैं। यही प्रत्याहार नामक योगांग है।
सूत्रार्थः—–नेत्रादि इन्द्रियों के अपने-2 विषयों से सम्बन्ध न होने पर जो मन के स्वरूप के अनुरूप (जैसा) हो जाना है, वह प्रत्याहार नामक योगांग है।
ऋग्वेदादि-भाष्य-भूमिकाः—–प्रत्याहार उसका नाम है कि जब पुरुष अपने मन को जीत लेता है। तब इन्द्रियों का जीतना अपने आप हो जाता है, क्योंकि मन ही इन्द्रियों का चलाने वाला है।
भावार्थः——“प्रत्याहार” शब्द का अर्थ है विषयों से विमुख(पृथक्) होना। इसमें इन्द्रियाँ बाह्य विषयों से विमुख होकर अन्तर्मुखी हो जाती हैं। आङ् पूर्वक हृञ् धातु, आहरण ( आकृष्ट) करने अर्थ में प्रयुक्त होती है। प्रति उपसर्ग ने उससे विपरीत अर्थ (विमुख होना) को द्योतित कर रहा है। मन के एकाग्र होने से इन्द्रियाँ भी मन का अनुसरण करने से एकाग्र हो जाती हैं। इस विषय में यह जानना चाहिए कि बाह्य नेत्रादि इन्द्रियाँ मन के सम्पर्क के बिना विषयों का ग्रहण नहीं कर सकतीं। इसीलिए जब हमारा ध्यान अन्यत्र होता है तो हम देखते हुए भी नहीं देख पाते और सुनते हुए भी सुन नहीं सकते। जब मन शुद्ध और एकाग्र होकर आत्मचिन्तन में लग जाता है तो ये दूसरी नेत्रादि इन्द्रियाँ विषयों से सम्बद्ध होकर भी उसका ज्ञान नहीं करा सकतीं। इसी बात को सूत्रकार ने कहा है कि इन्द्रियाँ अपने विषयों से असम्बद्ध होकर चित्त का अनुसरण वैसे ही करने लगती हैं, जैसे मधुमक्खियाँ अपनी मधुकर-रानी मक्खी का अनुसरण करती हैं। राजा मन के निरोध होने से इन्द्रियों का भी निरोध हो जाता है। योग की इस स्थिति को ही “प्रत्याहार” नाम से कहा गया है।
प्रत्याहार का फल
===============
“ततः परमा वश्यतेन्द्रियाणाम् ।।” ( योगदर्शन–२.५५)
व्यास-भाष्यः—“शब्दादिष्वव्यसनमिन्द्रियजय इति केचित्। सक्तिर्व्यसनं व्यस्यत्येनं श्रेयस इति। अविरुद्धा प्रतिपत्तिर्न्याय्या। शब्दादिसंप्रयोगः स्वेच्छयेत्यन्ये। रागद्वेषाभावे सुखदुःखशून्यं शब्दादिज्ञानमिन्द्रियजय इति केचित्। चित्तैकाग्र्याद प्रतिपत्तिरेवेति जैगीषव्यः। ततश्च परमात्वियं वश्यता यच्चित्त-निरोधे निरुद्धानीन्द्रियाणि नेतरेन्द्रियजयवत्प्रयत्न-कृतमुपायान्तरमपेक्षन्ते योगिन इति।।
भाष्यानुवादः—परमावश्यता–स्वाधीनता–इन्द्रियजय के विषय में कुछ लोग ऐसा मानते है कि इन्द्रियों की शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध विषयों में आसक्ति न होना ही इन्द्रिय जय है। (व्यसन की व्याख्या—)— आसक्ति ही व्यसन है, क्योंकि प्राणियों को यह कल्याण-मार्ग से दूर कर देता है। और जो अविरुद्ध (शास्त्रों के अनुकूल प्रतिपत्तिः) विषयों का भोग करना है, वह न्यायोचित है।दूसरे लोग ऐसा मानते है कि स्वेच्छा से (भोगों के वशीभूत होकर नहीं) इन्द्रियों का शब्दादि विषयों के साथ सम्पर्क करना इन्द्रिय जय है। कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि विषयों के प्रति राग और द्वेष से रहित होकर शब्दादि विषयों का सुख-दुःख से पृथक् होकर अनुभव करना इन्द्रिय जय है। और जैगीषव्य मुनि का मानना है कि चित्त की एकाग्रता होने के कारण शब्दादि विषयों में प्रवृत्ति का न होना ही इन्द्रिय जय है। इनमें श्रेष्ठ उपाय है–चित्त के निरोध होने पर इन्द्रियाँ भी निरुद्ध हो जाती हैं। इससे योगी लोग दूसरी इन्द्रियों के जय के समान पृथक् से किए गए दूसरे उपायों की , अपेक्षा आवश्यकता अनुभव नहीं करते है।
ऋग्वेदादि-भाष्य-भूमिकाः—-तब वह मनुष्य जितेन्द्रिय होके जहाँ अपने मन को ठहराना व चलाना चाहे, उसी में ठहरा और चला सकता है और फिर उसको ज्ञान हो जाने से सदा सत्य में प्रीति हो जाती है और असत्य में कभी नहीं।
प्रत्याहार की स्थिति के बाद इन्द्रियों की सर्वोत्कृष्ट स्वाधीनता (जितेन्द्रियता) हो जाती है।
भावार्थः——इस स्तर पर पहुँच कर इन्द्रियाँ पूर्ण रूपेण वश में हो जाती है। फिर किसी अन्य उपाय की आवश्यकता नहीं रहती। ऋषि व्यास ने इन्द्रिय-जय के सम्बन्ध में अनेक आचार्यों की परिभाषाएँ दी हैं—–
(१.)  शब्दादि-विषयों में न फँसना,
(२.) स्वेच्छा से भोग भोगना, आसक्त होकर नहीं,
(३.) राग-द्वेष के अभाव होने पर सुख-दुःख से रहित होकर शब्दादि-विषयों का अनुभव करना इन्द्रिय-जय है।
(४.) चित्त की एकाग्रता होने पर शब्दादि-विषयों में प्रवृत्त न होना इन्द्रिय-जय है।
इन सब में अन्तिम पक्ष ही सर्वोत्कृष्ट है। शेष अपूर्ण इन्द्रिय-जय है, क्योंकि उनमें भोगों के प्रति लालसा बनी रहती है। अतः मन के निरोध होने से इन्द्रियों का निरोध होना ही परमावश्यता (इन्द्रिय-जय) है।
(६.) धारणा
===========
उक्तानि पञ्च बहिरङ्गानि साधनानि धारणा वक्तव्या—-
यम से लेकर प्रत्याहार तक योग के पाँच बहिरंग साधन माने गए हैं। अब योग के अन्तरङ्ग अङ्ग प्रारम्भ हो रहे हैं ।
पहला अन्तरंग धारणा है, जिसका प्रथम सूत्र है—
“देशबन्धश्चित्तस्य धारणा”—(योगदर्शन-३.१)
जब उपासना योग के पूर्वोक्त पाँचों अङ्ग सिद्ध हो जाते हैं, तब उसका छठा अङ्ग धारणा भी यथावत् प्राप्त होती है। धारणा उसको कहते हैं कि मन को चञ्चलता से छुडा के नाभि, हृदय, मस्तक, नासिका और जीभ के अग्रभाग आदि देशों (अङ्गों) में स्थिर करके ओङ्कार का जप और उसका अर्थ जो परमेश्वर है उसका विचार करना…..(ऋ.वे.भू)।
व्यास-भाष्यः—–नाभिचक्रे, हृदयपुण्डरीके, मूर्ध्नि ज्योतिषि, नासिकाग्रे, जिह्वाग्रे इत्येवमादिषु देशेषु बाह्ये वा विषये चित्तस्य वृत्तिमात्रेण बन्ध इति धारणा।” 
नाभि, हृदय, मूर्धाज्योति अर्थात् नेत्र, नासिकाग्र जिह्वाग्र इत्यादि देशों के बीच में चित्त को योगी धारण करे, तथा बाह्य विषय जैसा कि ओङ्कार वा गायत्री मन्त्र इनमें चित्त लगावें, क्योंकि “तज्जपस्तदर्थभावना” (योगदर्शन १.२८)। इसका योगी जप अर्थात् चित्त से पुनः-पुनः आवृत्ति करे और इसका अर्थ जो ईश्वर उसको हृदय में विचारे। “तस्य वाचकः प्रणवः” (योगदर्शन–१.२७)। ओङ्कार का वाच्य ईश्वर है और उसका वाचक ओङ्कार है। बाह्य विषय से इनको ही लेना और किसी दूसरे विषय को नहीं क्योंकि अन्य प्रमाण कहीं नहीं।
धारणा के विषय में
=================
ये पाँच अङ्ग बाह्य कहलाते हैं—-यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार। मुख्य रूप से योग के साधनों का कथन होने से योग-दर्शन के द्वितीय पाद (अध्याय) का नाम “साधनपाद” रखा गया। योग के शेष तीन अङ्ग—-धारणा, ध्यान और समाधि——को तीसरे पाद (अध्याय) “विभूतिपाद” में रखा गया है। ये अवशिष्ट होने से अन्तरंग हैं। योगी इनसे विशेष सिद्धि या ऐश्वर्य प्राप्त करता है। ये सिद्धियाँ विभूति के रूप में हैं, अतः इन्हें “विभूतिपाद” में रखा गया है।
यद्यपि धारणादि भी योग के ही अङ्ग हैं, अतः समस्त योगांगों का एकत्र कथन करना ही उचित था, पुनरपि इन तीन अङ्गों को विभूतिपाद में क्यों रखा गया ? ऐसी आशंका का होना पाठकों के लिए स्वाभाविक था। इसका समाधान पतञ्जलि ने स्वयं दिया है–योगदर्शन ३.७  में। यम-नियमादि साधनों की अपेक्षा योगसाधना में धारणादि तीनों साधन अन्तरङ्ग हैं। यम-नियम बहिरंग क्यों हैं ? क्योंकि ये अंग चित्त को अविद्यादि क्लेशों की शुद्धि करने से योग के लिए उपयोगी बनाने वाले हैं, जिससे चित्त की वृत्ति एकाग्र होकर योग में लग सके। जैसे कृषक बीज बोने से पहले भूमि को जोतकर स्वच्छ और उपजाऊ बनाता है, वैसे ही बहिरंग साधनों से चित्त स्वच्छ तथा सूक्ष्म विषय को जानने का सामर्थ्य प्राप्त कर लेता है। अतः ये धारणादि योग के साक्षात् प्रमुख साधन हैं और योगांगों में भी आठवाँ अंग भी समाधि प्रथम अंगों का फल होने से विभूति है और उस विभूति की प्राप्ति में धारणा और ध्यान का साक्षात् सम्बन्ध है। अतः इन तीनों को “विभूतिपाद” में रखा गया है।
विमर्श-चित्त को शरीर के किसी नाभिचक्रादि अंग-विशेष में विषयान्तर से हटाकर बाँध (रोकने) देने या स्थिर करने का अभ्यास करना धारणा कहलाती है। परन्तु यह देशबन्ध शरीर के अन्दर ही होना चाहिए, बाह्य किसी पदार्थ या स्थान में नहीं। इस सूत्र के भाष्य में आचार्य व्यास ने “बाह्ये वा विषये” लिखा है, जिसका अर्थ प्रायः व्याख्याकार शरीर से बाहर किसी स्थान या पदार्थ में चित्त को रोकना अर्थ करते हैं, परन्तु यह अर्थ यहाँ संगत नहीं है। यहाँ पर सही अर्थ प्रणव-जप और तदर्थ-भावना है, जो प्रकरण से संगत भी है। योगशास्त्र में प्रणवजप का विधान किया गया है। धारणा का सम्बन्ध ध्यान और समाधि से है और ये तीनों योगांग अन्तरंग हैं, यह सूत्रकार ने ३.७ पर स्वयं माना है। अन्तरंग शब्द इस विषय में बहुत स्पष्ट कर रहा है कि धारणा अन्तरंग होने से शरीर के अन्दर ही करनी चाहिए, बाहर नहीं और वह अर्थ व्यावहारिक भी नहीं है। क्योंकि जब इन्द्रियाँ बाहर कार्य कर रही होंगी तो मन का सम्बन्ध भी नहीं होगा और मन बाह्य सान्त पदार्थों में कभी स्थिर नहीं हो सकता अर्थात् बँध नहीं सकता। इसलिए अन्दर ही प्रणवोपसना के द्वारा इसे रोका जा सकता है और जहाँ धारणा की जाएगी वहीं ध्यान लगाना पडेगा, यह बात सूत्रकार ने ३.२ में “तत्र” पद से स्पष्ट की है। धारणा बाहर होगी तो ध्यान भी बाहर होगा। किन्तु बाह्य ध्यान में प्रत्ययैकतानता (ज्ञानवृत्ति) की एकाग्रता कदापि संभव नहीं है। इसलिए धारणा शरीर से बाहर करना सूत्रकार और भाष्यकार दोनों के आशय से विरुद्ध होने से असंगत है।
(७.) ध्यान
===========
ध्यान किसे कहते है ?
“तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्।।” (योगदर्शन–३.२)
धारणा के पीछे उसी देश में ध्यान करने और आश्रय लेने के योग्य जो अन्तर्यामी व्यापक परमेश्वर है, उसके प्रकाश और आनन्द में अत्यन्त विचार और प्रेमभक्ति के साथ इस प्रकार प्रवेश करना कि जैसे– समुद्र के बीच में नदी प्रवेश करती है। उस समय में ईश्वर को छोड किसी अन्य पदार्थ का स्मरण नहीं करना, किन्तु उसी अन्तर्यामी के स्वरूप और ज्ञान में मग्न हो जाना, इसी का नाम ध्यान है।
व्यास-भाष्यः—“तस्मिन्देशे ध्येयालम्बनस्य प्रत्ययस्यैकतानता सदृशः प्रवाहः प्रत्ययान्तरेणापरामृष्टो ध्यानम्।।”
अर्थः—उन देशों में अर्थात् नाभि, हृदय, नेत्र, नासिकाग्र, जिह्वाग्र इत्यादि में ध्येय जो (परम) आत्मा उस आलम्बन की ओर चित्त की एकतानता अर्थात् परस्पर दोनों की एकता, चित्त आत्मा से भिन्न न रहे तथा आत्मा चित्त से पृथक् न रहे, उसका नाम है—सदृश प्रवाह। जब चित्त चेतन से ही युक्त रहे, अन्य प्रत्यय (कोई पदार्थान्तर) का स्मरण न रहे, तब जानना कि ध्यान ठीक हुआ।
प्रथम-प्रश्न—(क) मूर्त (भौतिक) पदार्थों के बिना ध्यान कैसे हो सकता है ?
उत्तरः–संसार में कई ऐसे पदार्थ हैं, जिनका आकार नहीं, किन्तु उनका अस्तित्व भी है और एहसास (अनुभव) भी। उदाहरण के लिए—शब्द का आकार नहीं होता, किन्तु फिर भी शब्द ध्यान में आता है। इसी प्रकार आकाश का कोई आकार नहीं, फिर भी आकाश का ज्ञान होता है। जीव का आकार नहीं, फिर भी जीव का ध्यान होता है। ज्ञान, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न ये नष्ट होते ही जीव निकल जाता है, यह एक साधारण व्यक्ति भी समझता है।
साकार का ध्यान कैसे करोगे ? साकार के गुणों का ज्ञानाकार होने तक ध्यान नहीं बनता अर्थात् संभव नहीं होता कि ज्ञान के पहले ध्यान हो जाए। एक सूक्ष्म परमाणु के भी अधम, उत्तम और मध्यम ऐसे अनेक विभाग ज्ञान-बल से कल्पना में आते हैं। अब कोई ऐसा कहे मुट्ठी में क्या है? तो विदित होने तक ढकी हुई मुट्ठी की ओर देखने से ही केवल उस पदार्थ का ध्यान कैसे करें। प्रत्यक्ष के सिवाय उस पदार्थ को जानने के लिए और भी दृढतर सबल उपाय है। देखो अनुमान—–। अनुमान ज्ञान के सम्मुख प्रत्यक्ष की क्या प्रतिष्ठा है। अभिप्राय है कि प्रत्यक्ष के अतिरिक्त जैसे अनुमान से भी पदार्थ को जाना जाता है. वैसे दृढतर रूप में परमात्मा को जानकर उपासना करनी चाहिए। सांसारिक पदार्थों में ध्यान करने से मन सांसारिक पदार्थों में ही लगा रहता है. परमात्मा में चित्त की दृढता नहीं होती, ध्यान सफल नहीं होता और मन बेचैन रहता है। अतः आवश्यकता इस बात की है कि परमपिता परमात्मा की उपासना की जाए।
ध्यान के विषय में दूसरा प्रश्न–
(२.) यद्यपि परमात्मा निराकार है तथापि ध्यान के लिए किसी सांसारिक मूर्ति की आवश्यकता होती ही है। अतः ध्यान के लिए कोई आधार तो चाहिए ही ।
उत्तरः–जब परमात्मा निराकार, सर्वव्यापक है, तब उसकी मूर्ति कैसे बन सकती है ? जो ये आभास है कि मूर्ति के देखने से परमेश्वर का स्मरण होता है, यह विचार आधारहीन है। क्योंकि यदि यह मूर्ति सामने नहीं होगी तो लोग एकान्त पाकर चोरी, जारी आदि कुकर्म (आजकल व्यभिचार, बलात्कार भी)करने में प्रवृत्त हो सकते हैं। क्योंकि ऐसे कुकर्म करने वाले जानते हैं कि इस समय यहाँ देखने वाला कोई नहीं है, इसलिए वह अनर्थ किए बिना नहीं रहता। जो पाषाण आदि मूर्तियों को न मानकर सर्वदा सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, न्यायकारी परमात्मा को सर्वत्र जानता और मानता है वह व्यक्ति कुकर्म कुचेष्टा नहीं कर सकता ।
ध्यान के विषय में तीसरा प्रश्न—-जब किसी मूर्तिमान् वस्तु को चाहे वह कैसी हो, आप नहीं मानते तो ध्यान किसका करें ?
उत्तर—कोई चीज मानकर ध्यान नहीं करना चाहिए। ईश्वर सर्वशक्तिमान्, सर्वसृष्टिकर्त्ता, सृष्टि को एक क्रम में चलाने वाला, नियन्ता, पालनकर्त्ता और ऐसे ही अनेक ब्रह्माण्डों का स्वामी और नियन्ता है। ऐसी-ऐसी उसकी महिमा का स्मरण करके अपने चित्त में उसकी महत्ता का ध्यान करना चाहिए। अर्थात् इसी प्रकार समस्त विशेषणों से युक्त परमेश्वर को स्मरण करके उसका ध्यान करना चाहिए और उसकी अपार महिमा का वर्णन करना चाहिए। यह ध्यान है।
(८.) समाधि
समाधि किसे कहते हैं ?
“तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः।।” (योगदर्शन–३.३)
सूत्रार्थः——ऊपर ध्यान का वर्णन किया गया है। वह ध्यान ही ध्येय वस्तु मात्र का प्रतीत होना और अपने स्वरूप से शून्य जैसा भान होना समाधि है।
ऋग्. वे. भा. भू.—जैसे अग्नि के बीच में लोहा भी अग्नि रूप हो जाता है, इसी प्रकार परमेश्वर के ज्ञान में प्रकाशमय होके अपने शरीर को भी भूले हुए के समान जानकर आत्मा को परमेश्वर के प्रकाशस्वरूप आनन्द और ज्ञान में परिपूर्ण करने को समाधि कहते हैं।
ध्यान और समाधि में अन्तर—यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान इन सातों अंगों का फल समाधि है।
जब ध्याता, ध्यान और ध्येय, इन तीनों का पृथक् भाव न रहे, तब जानना कि समाधि सिद्ध हो गई।
“ध्यानसमाधयोरयं भेदः ध्याने मनसो ध्यातृध्यानध्येयाकारेण विद्यमाना वृत्तिर्भवति, समाधौ तु परमेश्वरस्वरूपे तदानन्दे च मग्नः स्वरूपशून्य इव भवति।”
ध्यान और समाधि में इतना ही भेद है कि ध्यान में तो ध्यान करने वाला जिस मन से जिस चीज का ध्यान करता है, वे तीनों विद्यमान रहते हैं। परन्तु समाधि में केवल परमेश्वर ही के आनन्दस्वरूप ज्ञान में आत्ममग्न हो जाता है, वहाँ तीनों का भेदभाव नहीं रहता। जैसे मनुष्य जल में डुबकी मार के थोडा समय भीतर ही रुका रहता है, वैसे ही जीवात्मा परमेश्वर के बीच में मग्न होकर फिर बाहर आता है।
व्यास-भाष्यः—“ध्यानमेव ध्येयाकारनिर्भासं प्रत्ययात्मकेन स्वरूपेण शून्यमिव यदा भवति ध्येयस्वभावावेशात् तदा समाधिरित्युच्यते।।” (योगदर्शन–३.३)
संयम किसे कहते हैं ?
“त्रयमेकत्र संयमः” (योगदर्शन–३.४)
जिस देश (स्थान) में धारणा की जाय़, उसी में ध्यान और उसी में समाधि अर्थात् ध्यान करने योग्य परमेश्वर में मग्न हो जाने को संयम कहते हैं। जो एक ही काल में तीनों का मेल होना है, अर्थात् धारणा से संयुक्त ध्यान और ध्यान से संयुक्त समाधि होती है। उनमें बहुत सूक्ष्म काल का भेद रहता है, परन्तु जब समाधि होती है तब आनन्द के बीच में तीनों का फल एक ही हो जाता है।
व्यास-भाष्य—“तदेतद्धारणाध्यानसमाधित्रयमेकत्र संयमः। एकविषयाणि त्रीणि साधनानि संयमः इत्युच्यते। तदस्य त्रयस्य तान्त्रिकी परिभाषा संयम इति।।”
अर्थः—जो धारणा, ध्यान और समाधि, तीनों का एक विषयक होना है, वह संयम कहलाता है। इन तीनों साधनों की एक शास्त्रीय परिभाषा संयम है। अर्थात् योगशास्त्र में संयम शब्द से धारणा, ध्यान और समाधि के सम्मिलित रूप का बोध होता है।

संयम के जय का फल
==================
“तज्जयात्प्रज्ञालोकः।।” (योगदर्शन ३.५)

ऊपर संयम के बारे में कहा गया है, संयम के जय –सम्यक् अभ्यस्त होने से योगी की समाधिजन्यप्रज्ञा (बुद्धि का आलोक) प्रकाश प्रकट हो जाता है, अर्थात् स्वच्छ एवं सूक्ष्म होने से प्रज्ञा विकसित हो जाती है।
व्यास-भाष्यः—“तस्य संयमस्य जयात् समाधिप्रज्ञाया भवत्यालोको यथा यथा संयमः स्थिरपदो भवति तथा तथेश्वर प्रसादात् समाधिप्रज्ञाविशारदी भवति।”
अर्थः—पूर्वोक्त सूत्रोक्त संयम के जय (जीत लेने) अभ्यस्त होने से समाधिप्रज्ञा (समाधिजन्य) प्रज्ञा (बुद्धि) का आलोक (प्रकाश) दीप्त हो जाता है और जैसे-जैसे संयम स्थिर पद अच्छी प्रकार से अभ्यस्त हो जाता है, वैसे-वैसे ईश्वर के अनुग्रह से समाधिजन्य प्रज्ञा विशारदी (अत्यन्त) निर्मल तथा सूक्ष्मविषय को भी शीघ्र ग्रहण करने वाली हो जाती है।
संयम का उत्तरवर्ती दशाओं में उपयोग
“तस्य भूमिषु विनियोगः ।।” ( योगदर्शन–३.६)
सूत्रार्थः—उन पूर्वावस्थाओं में अभ्यस्त संयम का उत्तरवर्ती अतिशय उन्नतदशाओं में उपयोग करना चाहिए।
व्यास-भाष्य का हिन्दी में अभिप्रायः—–
उस संयम का जिसने योगसाधना भूमि (अवस्था विशेष) को जीत लिया है अर्थात् अभ्यास कर लिया है, उसका अनन्तर (व्यवधान रहित) अतिशय निकट क्रमप्राप्त अगली अवस्थाओं में विनियोग (उपयोग) लेना चाहिए, क्योंकि नीचे की अथवा प्रथम भूमि (अवस्थाओं) को बिना जीते उससे उत्तरवर्ती भूमि का उल्लंघन करके (बिना जीते प्रान्तभूमि) अत्युच्च सूक्ष्म भूमियों में संयम नहीं किया जा सकता और उस संयम के बिना योगी को प्रज्ञालोक (समाधिजन्य बुद्धि) का प्रकाश कैसे प्राप्त हो सकता है ? और ईश्वर के अनुग्रह से यदि योगी ने उत्तर भूमि (उच्च दशा) में संयम का अभ्यास कर लिया है तो उसको निचली परचित्त (ज्ञानादि अवस्थाओं) में संयम करना युक्त नहीं अर्थात् उन्नत दशा को प्राप्त होकर अधर (दशा) में संयम करना व्यर्थ है। उसका कारण यह है कि उस प्रयोजन का (अधारभूमि) में संयम करने का, संयम से भिन्न (उपाय) ईश्वरानुग्रह से ही बोध अथवा सिद्धि हो जाती है (और यह जानने के लिए कि) इस भूमि (दशा) की अनन्तर भूमि कौन-सी है, इस विषय में योग (योग का अभ्यास ही उपाध्याय) गुरु होता है इसका कारण ऐसा कहा गया है—
“योगेन योगो ज्ञातव्यो योगो योगात् प्रवर्तते।
यो अप्रमत्तस्तु योगेन स योगे रमते चिरम्।।”
योग से योग को जानना चाहिए। योग के अभ्यास से योग आगे बढता है। जो योगी योग-साधनों में प्रमाद नहीं करता अर्थात् सदा अभ्यास करता है, वह योग (योगाभ्यासरूपी) गुरु से योगसाधना में दीर्घकाल तक रमण करता है।

===============================
Website :—
www.vaidiksanskritk.com
www.shishusanskritam.com
===============================
वैदिक साहित्य की जानकारी प्राप्त करें—
www.facebook.com/vaidiksanskrit
www.facebook.com/shabdanu
लौकिक साहित्य पढें—
www.facebook.com/laukiksanskrit
आचार्य चाणक्य की नीति
www.facebook.com/chaanakyaneeti
www.vaidiksanskritk.com
www.shishusanskritam.com
संस्कृत नौकरियों के लिए—
www.facebook.com/sanskritnaukari
आयुर्वेद और हमारा जीवनः–
www.facebook.com/aayurvedjeevan
चाणक्य-नीति पढें—
www.facebook.com/chaanakyaneeti
आर्ष-साहित्य और आर्य विचारधारा के लिए
www.facebook.com/aarshdrishti
सामान्य ज्ञान प्राप्त करें—
www.facebook.com/jnanodaya
संस्कृत सीखें—
www.facebook.com/shishusanskritam
संस्कृत निबन्ध पढें—-
www.facebook.com/girvanvani
संस्कृत काव्य का रसास्वादन करें—
www.facebook.com/kavyanzali
संस्कृत सूक्ति पढें—
www.facebook.com/suktisudha
संस्कृत की कहानियाँ पढें—
www.facebook.com/kathamanzari
आर्यावर्त्त का गौरव—
www.facebook.com/aryavartgaurav
संस्कृत में मनोरंजन–
www.facebook.com/patakshepa